विस्तृत उत्तर
किसी भी वैदिक कर्मकांड का मूल आधार 'संकल्प' होता है। बिना संकल्प के किए गए कर्म का फल यजमान को प्राप्त नहीं होता।
यजमान हाथ में जल, अक्षत (शालिग्राम जी के निमित्त तिल), पुष्प, द्रव्य (सिक्का) और कुशा लेकर देश-काल, गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए महा-संकल्प लें:
ॐ अद्य... (वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि और वार)... अमुक स्थाने (स्थान का नाम), अहं अमुक गोत्रः (गोत्र), अमुक शर्मा/वर्मा/गुप्तः (नाम), श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं, मम स-कुटुंबस्य सर्वपाप क्षयार्थं, आयुरारोग्य ऐश्वर्य प्राप्त्यर्थं, श्रीविष्णु प्रसन्नता च कामनया, श्री शालिग्राम-तुलसी विवाहं कर्म अहं करिष्ये।
यह संकल्प यजमान के मन, वचन और कर्म को एकाग्र कर अनुष्ठान के प्रति उसकी पूर्ण निष्ठा को ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जोड़ देता है।





