विस्तृत उत्तर
विवाह का सर्वाधिक भावुक और पुण्यदायी क्षण 'कन्यादान' है। यजमान अपनी पुत्री के समान पाली गई तुलसी का एक कोमल पत्ता (पल्लव) या पुष्प-मंजरी दाहिने हाथ के अंगूठे से पकड़कर श्री शालिग्राम (दामोदर) के हस्त में अर्पित करते हैं।
इस समय निम्नलिखित शास्त्रसम्मत श्लोकों का उच्चारण किया जाता है:
अनादि मध्य निधनात्रैलोक्य परिरक्षक। इमां गृहाण तुलसीं विवाह विधिनेश्वर॥
(हे तीनों लोकों के रक्षक! कृपा कर इस तुलसी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।)
पयोघटैश्च सेवाभी: कन्या विवर्धिता मया। त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं दास्यामि त्वं गृहाण भो:॥
(मैंने इस कन्या को दूध-जल से सींचकर बड़ा किया है। हे प्रभु! आपकी प्रिया तुलसी को आपको अर्पित करता हूँ।)
यह प्रक्रिया अहंकार के विसर्जन और भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति का प्रतीक है।
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