विस्तृत उत्तर
भगवान का अनुभव करना — यही मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है। शास्त्र और संत-परंपरा इसके कई मार्ग बताते हैं।
पहला मार्ग है नाम-स्मरण — श्रीमद्भागवत (12.3.51-52) के अनुसार कलियुग में केवल हरि के नाम का संकीर्तन ही सतयुग के तप, त्रेता के यज्ञ और द्वापर की पूजा-अर्चना के बराबर फल देता है। जप-कीर्तन से हृदय शुद्ध होता है और भगवद्-चेतना जागती है।
दूसरा मार्ग है सत्संग — जहाँ हरि-कथा होती है, वहाँ भगवान स्वयं उपस्थित होते हैं। संत-सत्संग मन को विषयों से हटाकर ईश्वर की ओर मोड़ता है।
तीसरा मार्ग है निस्वार्थ सेवा — प्रत्येक प्राणी में ईश्वर देखकर सेवा करने से भगवान का अनुभव होता है। 'शिवज्ञान से जीव-सेवा' — यह विवेकानंद का सूत्र है।
चौथा मार्ग है ध्यान — एकांत में बैठकर, मन को भगवान के स्वरूप पर एकाग्र करना। जब मन पूरी तरह भगवान में डूब जाए तो आनंद का अनुभव होता है — यही भगवद्-अनुभव है।
पाँचवाँ मार्ग है शरणागति — 'सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (गीता 18.66) — सब छोड़कर भगवान के शरण में जाना। जब जीव पूर्णतः समर्पित हो जाता है, भगवान स्वयं उसकी देखभाल करते हैं और उसे अपना अनुभव कराते हैं।
भगवान का अनुभव अचानक नहीं होता — यह साधना की निरंतरता, विश्वास की दृढ़ता और अहंकार के धीरे-धीरे गलने से होता है।





