विस्तृत उत्तर
दास्य भाव = ईश्वर = स्वामी, मैं = दास/सेवक:
क्या है: 'मैं तेरा दास। तू मेरा स्वामी। तेरी सेवा = मेरा जीवन।' विनम्रता + समर्पण।
उदाहरण
- ▸हनुमान-राम: 'दास हनुमान' = दास्य भक्ति सर्वोच्च। 'राम काज किन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम।'
- ▸लक्ष्मण-राम: 14 वर्ष सेवा = दास्य।
- ▸गरुड़-विष्णु: वाहन = सेवक = दास्य।
भाव: 'प्रभु आदेश = मेरा कर्तव्य। मेरी इच्छा = शून्य। तेरी इच्छा = सर्वस्व।'
लाभ: अहंकार ↓↓ (दास = अहंकार विपरीत)। सेवा = कर्म योग। विनम्रता = मोक्ष द्वार।





