विस्तृत उत्तर
शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से इस लोक को निवासियों के आधार पर मुख्य रूप से दो स्पष्ट भागों में विभाजित किया जा सकता है। ऊपरी भुवर्लोक वह क्षेत्र है जो राहु के ठीक नीचे है जहाँ सिद्धों, चारणों और विद्याधरों का निवास है। ये सात्त्विक और रजोगुणी स्वभाव के होते हैं और इनका जीवनकाल मनुष्यों की तुलना में अत्यंत दीर्घ (हजारों वर्ष) होता है। ये सत्ताएं पृथ्वी का स्पर्श नहीं करतीं और अंतरिक्ष में ही विचरण करती हैं। निचले भुवर्लोक में जहाँ सघन वायु बहती है और बादल तैरते हैं वह यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत और प्रेतों का क्रीड़ा-स्थल या विचरण का क्षेत्र है जिसे 'विहाराजिरम्' कहा गया है। ये तामसिक और सूक्ष्म सत्ताएं हैं।
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