विस्तृत उत्तर
यह दृश्य अक्सर हमें भीतर से विचलित कर देता है — एक बेईमान व्यक्ति ऐशो-आराम में जी रहा है और एक सच्चा, ईमानदार व्यक्ति संघर्ष कर रहा है। हिंदू दर्शन इसका उत्तर बहुत गहराई से देता है।
सबसे पहले, जो हम देख रहे हैं वह पूरी तस्वीर नहीं है। हम केवल इस एक जन्म को देख रहे हैं, जबकि आत्मा का सफर अनेक जन्मों में फैला है। जिस व्यक्ति को हम आज 'बुरा' और 'सफल' देख रहे हैं, वह वास्तव में पिछले जन्मों में किए गए अच्छे कर्मों का फल भोग रहा होता है। उसके संचित पुण्यों का उपयोग हो रहा है, जबकि वर्तमान के पाप कर्मों का बोझ उसके अगले जन्मों में उठाना होगा।
दूसरे, सांसारिक सफलता और आध्यात्मिक उन्नति अलग-अलग हैं। बुरे व्यक्ति की संपत्ति और यश दिखता है, लेकिन उसके मन की अशांति, भय, और संबंधों की टूटन नहीं दिखती। वह भीतर से रिक्त होता है।
तीसरे, ईश्वर की न्याय व्यवस्था में देरी होती है, चूक नहीं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि पाप का फल तत्काल न भी मिले, लेकिन मिलता अवश्य है — जैसे गर्मी में बोया बीज बरसात में फलता है। दुर्योधन ने सालों तक वैभव भोगा, पर अंत में नाश को प्राप्त हुआ।
चौथे, अच्छे लोगों की परेशानी कभी-कभी उनका परीक्षण होती है जो उन्हें और परिपक्व बनाती है, जैसे धनुष की प्रत्यंचा जितनी खिंचती है, बाण उतना दूर जाता है। राम, पांडव, हरिश्चंद्र — ये सभी अनेक कष्टों से गुजरे, परंतु इतिहास में अमर हो गए।





