विस्तृत उत्तर
दशमहाविद्या — शक्ति तंत्र की दस महाशक्तियों की सम्पूर्ण व्यवस्था:
दशमहाविद्या की उत्पत्ति (देवीभागवत 7वाँ स्कंध)
जब शिव दक्ष-यज्ञ में जाने की अनुमति सती को नहीं दे रहे थे — सती ने दस दिशाओं में दस रूप प्रकट किए। शिव को दसों दिशाओं में दस अलग-अलग भयंकर देवियाँ दिखीं — यही दशमहाविद्याएं हैं।
दशमहाविद्याएं — क्रम, मंत्र-बीज और फल
| क्रम | देवी | बीज मंत्र | प्रमुख फल |
|---|---|---|---|
| 1 | काली | क्रीं | काल-जय, भय-नाश |
| 2 | तारा | ह्रीं/त्रीं | वाक्-सिद्धि, नौ-विपदा से रक्षा |
| 3 | त्रिपुरसुंदरी (षोडशी) | ह्रीं/क्लीं/सौः | सौंदर्य, सम्पदा, मोक्ष |
| 4 | भुवनेश्वरी | ह्रीं | भूमि-सिद्धि, राज्य-प्राप्ति |
| 5 | भैरवी (त्रिपुरभैरवी) | ह्स्रैं/ह्स्क्ल्रीं/ह्स्रौं | तप-सिद्धि, शत्रु-नाश |
| 6 | छिन्नमस्ता | श्रीं/ह्रीं/क्लीं | आत्म-बलिदान, शक्ति-संचय |
| 7 | धूमावती | धूं | विघ्न-नाश, वैधव्य-दोष-निवारण |
| 8 | बगलामुखी | ह्लीं | शत्रु-स्तम्भन, वाक्-रोध |
| 9 | मातंगी | ह्रीं | वाक्-सिद्धि, संगीत, वशीकरण |
| 10 | कमला | श्रीं | धन, वैभव, लक्ष्मी-कृपा |
दशमहाविद्या साधना की विशेषता
तंत्रसार: इन दसों देवियाँ — एक ही परमशक्ति के दस रूप हैं। किसी एक की सिद्धि = शेष नौ का आंशिक प्रभाव स्वतः।
दशमहाविद्या की श्रेणियाँ (तंत्र के अनुसार)
- ▸सात्विक: त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, कमला, मातंगी
- ▸राजसिक: तारा, भैरवी
- ▸तामसिक/उग्र: काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी
कौन सी महाविद्या की साधना करें
शाक्त प्रमोद: जन्म-कुंडली, इष्टदेव, और उद्देश्य के आधार पर गुरु उचित महाविद्या बताते हैं। सामान्यतः — काली (भय-नाश), लक्ष्मी/कमला (धन), त्रिपुरसुंदरी (मोक्ष)।