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ध्यान📜 भगवद्गीता, कठोपनिषद, पतञ्जलि योगसूत्र1 मिनट पठन

ध्यान करने से आत्मिक शांति कैसे मिलती है?

संक्षिप्त उत्तर

ध्यान से शांति: पतञ्जलि — चित्त-वृत्ति-निरोध → द्रष्टा स्वरूप में स्थित। गीता (6.15): नित्य ध्यानी को 'निर्वाण-परम शांति'। क्रम: ध्यान → विचार मंद → प्रतिक्रिया कम → अहंकार शमन → आत्म-बोध → शांति।

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विस्तृत उत्तर

ध्यान से आत्मिक शांति का संबंध चित्त की वृत्तियों के निरोध से है।

शास्त्रीय व्याख्या

पतञ्जलि योगसूत्र (1.2-3): 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।' — जब चित्त की वृत्तियाँ रुकती हैं, तब द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है — यही शांति है।

भगवद्गीता (6.15): 'युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।' — नित्य ध्यान करने वाला योगी परम शांति को प्राप्त होता है।

शांति प्राप्ति की प्रक्रिया

  1. 1ध्यान → विचारों की गति मंद
  2. 2मंद विचार → भावनात्मक प्रतिक्रिया कम
  3. 3कम प्रतिक्रिया → अहंकार का शमन
  4. 4अहंकार-शमन → आत्मा का बोध
  5. 5आत्म-बोध → स्थायी शांति

कठोपनिषद (2.3.10-11): आत्मा इंद्रियों से सूक्ष्म है; इंद्रियाँ मन से, मन बुद्धि से — जब बुद्धि स्थिर होती है तो आत्मा का स्वरूप प्रकट होता है। यही परम शांति है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता, कठोपनिषद, पतञ्जलि योगसूत्र
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