विस्तृत उत्तर
ध्यान से आत्मिक शांति का संबंध चित्त की वृत्तियों के निरोध से है।
शास्त्रीय व्याख्या
पतञ्जलि योगसूत्र (1.2-3): 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।' — जब चित्त की वृत्तियाँ रुकती हैं, तब द्रष्टा (आत्मा) अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है — यही शांति है।
भगवद्गीता (6.15): 'युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।' — नित्य ध्यान करने वाला योगी परम शांति को प्राप्त होता है।
शांति प्राप्ति की प्रक्रिया
- 1ध्यान → विचारों की गति मंद
- 2मंद विचार → भावनात्मक प्रतिक्रिया कम
- 3कम प्रतिक्रिया → अहंकार का शमन
- 4अहंकार-शमन → आत्मा का बोध
- 5आत्म-बोध → स्थायी शांति
कठोपनिषद (2.3.10-11): आत्मा इंद्रियों से सूक्ष्म है; इंद्रियाँ मन से, मन बुद्धि से — जब बुद्धि स्थिर होती है तो आत्मा का स्वरूप प्रकट होता है। यही परम शांति है।




