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ध्यान साधना📜 हठयोग प्रदीपिका 2/1-2, भगवद गीता 4/29, 5/27, अमृतबिंदु उपनिषद, छान्दोग्य 1/3/42 मिनट पठन

ध्यान के दौरान सांस पर ध्यान क्यों दिया जाता है?

संक्षिप्त उत्तर

ध्यान में श्वास पर इसलिए ध्यान दिया जाता है क्योंकि — 'चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्' (हठयोग प्रदीपिका 2/2) — श्वास स्थिर होने से मन स्थिर होता है। श्वास सदा वर्तमान में है, मन का द्वार है और अजपा-जप 'सोऽहम्' का आधार है।

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विस्तृत उत्तर

## ध्यान के दौरान सांस पर ध्यान क्यों दिया जाता है?

श्वास और मन का अभिन्न सम्बन्ध

हठयोग प्रदीपिका (2/2) में कहा गया है:

*'चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।'*

— श्वास चलती है तो मन चलता है; श्वास स्थिर होती है तो मन स्थिर होता है। यह श्वास और मन का मूल नियम है।

श्वास पर ध्यान क्यों देते हैं — पाँच कारण

### 1. श्वास सदा वर्तमान में है

मन भूत-भविष्य में भटकता है; श्वास केवल अभी है — इस श्वास में, इस क्षण में। श्वास पर ध्यान रखने से मन वर्तमान में टिकता है।

### 2. श्वास और प्राण एक हैं

छान्दोग्य उपनिषद (1/3/4) में श्वास को प्राण का स्थूल रूप बताया गया है। श्वास पर ध्यान देने से सूक्ष्म प्राण-शक्ति भी नियंत्रित होती है।

### 3. श्वास मन का द्वार है

— भयभीत होने पर श्वास तेज होती है

— शांत होने पर श्वास धीमी होती है

— श्वास की गति बदलकर मन की अवस्था बदली जा सकती है

### 4. श्वास सार्वभौमिक है — कोई तैयारी नहीं

कोई विशेष मंत्र, देवता या मान्यता की आवश्यकता नहीं — श्वास सबके पास है, सदा उपलब्ध है।

### 5. अजपा-जप — सोऽहम्

प्रत्येक श्वास के साथ 'सो' और 'हम्' — 'मैं वही ब्रह्म हूँ' — यह अजपा-जप स्वाभाविक रूप से चलता है। प्रतिदिन 21,600 बार।

गीता (4/29) में प्राण-साधना

*'प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।'*

— प्राण और अपान को सम करके, नासिका में श्वास को स्थिर करके ध्यान करें।

व्यावहारिक विधि

  • श्वास को नियंत्रित मत करें — केवल देखें
  • श्वास नासिका में प्रवेश करे — वहाँ अनुभव करें
  • छाती या पेट उठे-गिरे — उसे महसूस करें
  • श्वास-लय में 'सो-हम्' जोड़ें
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शास्त्रीय स्रोत
हठयोग प्रदीपिका 2/1-2, भगवद गीता 4/29, 5/27, अमृतबिंदु उपनिषद, छान्दोग्य 1/3/4
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