विस्तृत उत्तर
## ध्यान के दौरान सांस पर ध्यान क्यों दिया जाता है?
श्वास और मन का अभिन्न सम्बन्ध
हठयोग प्रदीपिका (2/2) में कहा गया है:
*'चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्।'*
— श्वास चलती है तो मन चलता है; श्वास स्थिर होती है तो मन स्थिर होता है। यह श्वास और मन का मूल नियम है।
श्वास पर ध्यान क्यों देते हैं — पाँच कारण
### 1. श्वास सदा वर्तमान में है
मन भूत-भविष्य में भटकता है; श्वास केवल अभी है — इस श्वास में, इस क्षण में। श्वास पर ध्यान रखने से मन वर्तमान में टिकता है।
### 2. श्वास और प्राण एक हैं
छान्दोग्य उपनिषद (1/3/4) में श्वास को प्राण का स्थूल रूप बताया गया है। श्वास पर ध्यान देने से सूक्ष्म प्राण-शक्ति भी नियंत्रित होती है।
### 3. श्वास मन का द्वार है
— भयभीत होने पर श्वास तेज होती है
— शांत होने पर श्वास धीमी होती है
— श्वास की गति बदलकर मन की अवस्था बदली जा सकती है
### 4. श्वास सार्वभौमिक है — कोई तैयारी नहीं
कोई विशेष मंत्र, देवता या मान्यता की आवश्यकता नहीं — श्वास सबके पास है, सदा उपलब्ध है।
### 5. अजपा-जप — सोऽहम्
प्रत्येक श्वास के साथ 'सो' और 'हम्' — 'मैं वही ब्रह्म हूँ' — यह अजपा-जप स्वाभाविक रूप से चलता है। प्रतिदिन 21,600 बार।
गीता (4/29) में प्राण-साधना
*'प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।'*
— प्राण और अपान को सम करके, नासिका में श्वास को स्थिर करके ध्यान करें।
व्यावहारिक विधि
- ▸श्वास को नियंत्रित मत करें — केवल देखें
- ▸श्वास नासिका में प्रवेश करे — वहाँ अनुभव करें
- ▸छाती या पेट उठे-गिरे — उसे महसूस करें
- ▸श्वास-लय में 'सो-हम्' जोड़ें





