विस्तृत उत्तर
हनुमानजी का जीवन शक्ति और भक्ति के सर्वोत्तम समन्वय का उदाहरण है। उनसे जीवन की हर स्थिति में शिक्षा मिलती है।
शक्ति और भक्ति का समन्वय — हनुमानजी असीम शक्तिशाली थे — पर्वत उठा सकते थे, सागर लाँघ सकते थे — परंतु उस शक्ति का उपयोग उन्होंने सदा राम के काम के लिए किया, अपने लिए कभी नहीं। शिक्षा — शक्ति का सही उपयोग तभी होता है जब वह सेवा में लगे, अहंकार में नहीं।
निःस्वार्थ सेवा — हनुमानजी ने लंका जलाई, संजीवनी लाए, वानर सेना को प्रेरित किया — पर कभी कोई पुरस्कार नहीं माँगा। उन्होंने कहा — 'प्रभु भगत जन रखवार' — मेरे प्रभु भक्त जनों के रक्षक हैं। शिक्षा — सेवा में प्रत्याशा नहीं होनी चाहिए।
गुरु-भक्ति — हनुमानजी ने राम को गुरु माना और सदा उनके चरणों में रहे। शिक्षा — गुरु-भक्ति और समर्पण सफलता की नींव है।
चिरंजीवी प्रेम — हनुमानजी को 'चिरंजीवी' कहते हैं। वे राम के नाम के कारण अमर हैं। शिक्षा — जो किसी महान उद्देश्य के साथ जीता है, वह भले ही न रहे परंतु उसका नाम और कर्म अमर रहते हैं।
संकट में धैर्य — लंका में अकेले जाना, अशोक वाटिका में माता सीता को ढूँढना — सब संकट में भी धैर्य न खोना। शिक्षा — सबसे कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और विवेक बनाए रखें।





