विस्तृत उत्तर
यह भगवद्गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध श्लोक है और कर्म योग का मूल मंत्र।
मूल श्लोक (गीता 2.47)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।'
चार चरणों का अर्थ
- 1'कर्मण्येव अधिकारः ते' — तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है।
- ▸अर्थ: तुम जो कर सकते हो, वह है कर्म (प्रयत्न)। कर्म तुम्हारे हाथ में है।
- 1'मा फलेषु कदाचन' — फल में कभी नहीं।
- ▸अर्थ: कर्म का फल (परिणाम) तुम्हारे नियंत्रण में नहीं — वह अनेक कारणों पर निर्भर है। फल की चिंता या आसक्ति मत रखो।
- 1'मा कर्मफलहेतुर्भूः' — कर्मफल का हेतु (कारण) मत बन।
- ▸अर्थ: 'मुझे यह फल चाहिए' — यह इच्छा कर्म का कारण न बने। कर्तव्य कर्म करो, लालच से नहीं।
- 1'मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि' — कर्म न करने (अकर्म) में भी आसक्ति मत रख।
- ▸अर्थ: 'फल नहीं मिलेगा तो कर्म ही क्यों करूं' — यह सोच भी गलत है। कर्म करना अनिवार्य है।
सामान्य गलतफहमी
- ▸❌ 'कर्म करो, फल की इच्छा मत करो' — अधूरा अर्थ। लक्ष्य/दिशा रखो, परंतु फल पर निर्भरता/आसक्ति मत रखो।
- ▸❌ 'बस काम करते रहो, कुछ नहीं मिलेगा' — गलत। कर्म का फल अवश्य मिलता है, परंतु उसकी चिंता में कर्म की गुणवत्ता मत गिरने दो।
सही अर्थ (संक्षेप)
पूरे मन और कौशल से कर्म करो। परिणाम जो भी हो — सफलता या असफलता — दोनों में समभाव रखो। न फल की लालसा कर्म का कारण बने, न फल न मिलने का भय कर्म रोके।





