विस्तृत उत्तर
भू-मण्डल के सबसे बाहरी छोर पर स्थित लोकालोक पर्वत का ब्रह्मांडीय महत्व अनेक स्तरों पर है। सर्वप्रथम यह भूलोक की भौतिक सीमा है — यह पर्वत उस क्षेत्र को विभाजित करता है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और जहाँ पूर्ण अंधकार रहता है। सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहमंडलों की किरणें इसी लोकालोक पर्वत तक ही भूलोक को प्रकाशित कर पाती हैं। इस पर्वत पर चारों दिशाओं में चार विशाल गजराज (हाथी) खड़े हैं जो इस ब्रह्माण्ड के संतुलन को बनाए रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि स्वयं भगवान नारायण (विष्णु) अपनी अचिन्त्य योगमाया से अष्ट-महासिद्धियों से युक्त होकर और अपने पार्षदों (विष्वक्सेन आदि) के साथ इस पर्वत पर निवास करते हैं। भगवान विष्णु वहाँ अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर समस्त लोकों के कल्याण और उनके भौगोलिक संरक्षण हेतु विराजते हैं। लोकालोक पर्वत के आगे ब्रह्माण्ड का आवरण है जो जल, अग्नि, वायु, आकाश और अहंकार आदि तत्वों से निर्मित है।
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