विस्तृत उत्तर
भू-मण्डल के सबसे बाहरी छोर पर सातों द्वीपों और समुद्रों के बहुत आगे एक अत्यंत रहस्यमय, दुर्गम और विशाल पर्वतमाला स्थित है जिसे 'लोकालोक पर्वत' कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के अनुसार यह पर्वत उस क्षेत्र को विभाजित करता है जहाँ सूर्य का प्रकाश पहुँचता है और जहाँ पूर्ण अंधकार रहता है। 'लोक' का अर्थ है सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित और बसा हुआ क्षेत्र तथा 'अलोक' का अर्थ है पूर्णतः अंधकारमय और निर्जन क्षेत्र। इस पर्वत की ऊँचाई और चौड़ाई दस हजार योजन बताई गई है और यह भू-मण्डल को चारों ओर से एक अभेद्य दीवार के समान घेरे हुए है। स्वयं भगवान नारायण (विष्णु) अपनी अचिन्त्य योगमाया से अष्ट-महासिद्धियों से युक्त होकर अपने पार्षदों के साथ इस पर्वत पर निवास करते हैं। लोकालोक पर्वत के आगे केवल अलौकिक अंधकार है।
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