विस्तृत उत्तर
महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती में श्मशान भस्म के उपयोग का प्रश्न जटिल और विवादित है:
प्राचीन परंपरा — श्मशान भस्म
Times Now Navbharat, Webdunia और TV9 Hindi के अनुसार: प्राचीन काल में महाकाल की भस्म आरती श्मशान घाट से लाई गई ताजी चिता की भस्म से होती थी। शिव = श्मशानवासी, भस्मधारी — श्मशान भस्म उनका स्वाभाविक आभूषण है।
श्मशान भस्म क्यों
- 1शिव = श्मशानवासी: शिव श्मशान में निवास करते हैं — श्मशान वह स्थान है जहां जीवन-मृत्यु का भेद समाप्त होता है।
- 2महाकाल = मृत्यु विजयी: भस्म = मृत्यु का अंतिम सत्य। शिव भस्म लगाकर संदेश देते हैं कि सब कुछ नश्वर है, आत्मा अमर।
- 3पंचतत्व विलय: चिता भस्म = पंचतत्वों में विलीन देह — शिव को अर्पित = मोक्ष प्राप्ति।
- 4वैराग्य का संदेश: भौतिक सुख क्षणिक हैं — यही भस्म आरती का मूल संदेश।
वर्तमान स्थिति (शोध आधारित — AajTak, Webdunia)
अब श्मशान भस्म का उपयोग नहीं होता। वर्तमान में:
- ▸कपिला गाय के गोबर से बने उपलों (कंडों) को शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश और बेर की लकड़ियों के साथ जलाकर भस्म तैयार की जाती है।
- ▸इसमें कपूर और गुगल भी मिलाया जाता है — भस्म सेहत के लिए भी उपयुक्त और स्वादिष्ट होती है।
- ▸यह भस्म तीन प्रकार की मानी जाती है: श्रौत (यज्ञ भस्म), स्मार्त (स्मृति विधि), और लौकिक (कंडे भस्म)।
Webdunia का स्पष्ट उल्लेख: 'ऐसा भी कहते हैं कि यहां श्मशान में जलने वाली सुबह की पहली चिता से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है, परंतु इसकी हम पुष्टि नहीं कर सकते।'
सार: प्राचीन परंपरा में श्मशान भस्म का उपयोग होता था (यह शिव के श्मशानवासी स्वरूप से जुड़ा था), किन्तु वर्तमान में शुद्ध गोबर-काष्ठ भस्म का उपयोग होता है।





