विस्तृत उत्तर
मंदिर में विवाह करना हिन्दू धर्म में अत्यन्त शुभ और शास्त्रसम्मत है। देवता की उपस्थिति में विवाह = दैवीय आशीर्वाद।
शास्त्रीय आधार
1देवता साक्षी
हिन्दू विवाह में अग्नि प्रमुख साक्षी है ('अग्निं साक्षी')। इसके साथ मंदिर में विवाह करने पर देवता भी साक्षी बनते हैं — यह दोहरा आशीर्वाद।
2गृह्य सूत्र
विवाह संस्कार में पवित्र स्थान का चयन अनिवार्य। मंदिर = सर्वाधिक पवित्र स्थान। अतः मंदिर में विवाह = उत्तम।
3सप्तपदी (सात फेरे)
सप्तपदी अग्नि के समक्ष होती है। मंदिर में अग्नि कुंड स्थापित कर सप्तपदी = देवता + अग्नि दोनों साक्षी।
मंदिर में विवाह की विशेषताएँ
- ▸देवता का प्रत्यक्ष आशीर्वाद
- ▸पवित्र वातावरण — सात्विक ऊर्जा
- ▸सरल और आडम्बर-रहित (प्रायः)
- ▸कम खर्च (बड़े मंडप/होटल की तुलना में)
- ▸आध्यात्मिक शुरुआत — विवाह = 'धर्म' की शुरुआत
किन मंदिरों में विवाह
- ▸अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में विवाह सेवा उपलब्ध — तिरुपति (कल्याण मंडपम), मीनाक्षी (मदुरै), इस्कॉन, आर्य समाज मंदिर
- ▸स्थानीय मंदिरों में भी — पुजारी/प्रबंधन से बात करें
- ▸गुरुद्वारों (सिख) में 'आनन्द कारज' विवाह प्रचलित
विधि (संक्षिप्त)
- ▸मंदिर से अनुमति और बुकिंग
- ▸शुभ मुहूर्त निर्धारण
- ▸पुरोहित (मंदिर का या स्वयं का)
- ▸कन्यादान, मंगलसूत्र, सिंदूरदान
- ▸सप्तपदी (सात फेरे — अग्नि के समक्ष)
- ▸देवता को प्रणाम — दम्पति का प्रथम दर्शन
- ▸प्रसाद वितरण
कानूनी मान्यता
हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार मंदिर में हिन्दू रीति-रिवाज से किया गया विवाह कानूनी रूप से मान्य है। विवाह पंजीकरण अवश्य करवाएँ।





