विस्तृत उत्तर
मंत्र जप में अचानक गहरी शांति = अत्यन्त शुभ — यह ध्यान की गहराई और मंत्र सिद्धि की ओर प्रगति का संकेत।
अर्थ
1. चित्त वृत्ति निरोध (योगसूत्र 1.2): 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' — चित्त की वृत्तियाँ (विचार-तरंगें) शांत = योग। जप से मन के विचार शांत → अचानक शून्यता/शांति = योग की झलक।
2. मंत्र शक्ति प्रभाव: मंत्र = विशिष्ट कम्पन। निरंतर जप से शरीर-मन उस कम्पन में लय = गहरी शांति। यह मंत्र शक्ति प्रमाण।
3. ध्यान अवस्था में प्रवेश: जप → धारणा → ध्यान (स्वाभाविक)। अचानक शांति = जप से ध्यान में स्वतः प्रवेश। बहुत शुभ।
4. 'अजपा जप': उन्नत अवस्था: मंत्र स्वतः चलने लगता है — प्रयास रहित। इस अवस्था में गहन शांति।
क्या करें: इस शांति में रहें — जबरदस्ती जप पुनः शुरू न करें। शांति = जप का फल — उसे अनुभव करें। धीरे-धीरे जब शांति स्वतः कम हो → जप पुनः। यह 'जप→शांति→जप' का चक्र = प्रगति।
नारद भक्ति सूत्र (5): 'यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवत्यमृतो भवति तृप्तो भवति।' — (प्रेम/भक्ति) प्राप्त कर मनुष्य सिद्ध, अमृत, तृप्त हो जाता है। जप की शांति = इस तृप्ति की झलक।





