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मंत्र सिद्धि📜 भगवद्गीता (6.11-12), कुलार्णव तंत्र (15.62), तंत्रसार, मंत्रमहार्णव, घेरण्ड संहिता2 मिनट पठन

मंत्र सिद्धि के दौरान कौन सा आसन उपयोग करें?

संक्षिप्त उत्तर

श्रेष्ठता क्रम: ऊनी कम्बल (सर्वाधिक व्यावहारिक — ऊर्जा संरक्षण), कुशासन (वेद-विहित), रेशम (देवी-साधना)। व्याघ्र/मृगचर्म — शास्त्रोक्त परंतु वन्यजीव कानून से वर्जित। प्लास्टिक/रबर सख्त वर्जित। मुद्रा: सिद्धासन या पद्मासन। पूरे अनुष्ठान में एक ही आसन।

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विस्तृत उत्तर

मंत्र-सिद्धि के दौरान आसन का विशेष महत्व है — यह सामान्य पूजा से अधिक कठोर नियमों के साथ है:

तंत्रसार — सिद्धि-साधना में आसन का सिद्धांत

आसनं मंत्रसिद्ध्यर्थं विशेषेण विधीयते।

— मंत्र-सिद्धि के लिए आसन की विशेष व्यवस्था की जाती है। गलत आसन = शक्ति का क्षरण।

सिद्धि-साधना में आसन की श्रेष्ठता का क्रम

1व्याघ्रचर्म (बाघ की खाल) — शास्त्र में सर्वोत्तम

कुलार्णव तंत्र: तांत्रिक साधना में व्याघ्रचर्म सर्वश्रेष्ठ माना गया है — इसे 'शक्ति का महान संवाहक' कहा गया है। परंतु: आधुनिक काल में वन्यजीव संरक्षण कानून के कारण यह पूर्णतः निषिद्ध है — इसका उपयोग न करें।

2ऊनी आसन (कम्बल) — सर्वाधिक व्यावहारिक और उत्तम

मंत्रमहार्णव: ऊनी आसन शरीर की विद्युत-ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता। जप और ध्यान के दौरान ऊर्जा का संरक्षण करता है। यह सर्वाधिक सुरक्षित और प्रभावशाली आसन है।

3कुशासन (दर्भासन)

भगवद्गीता (6.11): कुश पर मृगचर्म, उस पर वस्त्र — यह वेद-विहित व्यवस्था है। कुश = पृथ्वी की सात्विक ऊर्जा का वाहक।

4मृगचर्म (हिरण की खाल)

शास्त्र में उल्लिखित — परंतु आधुनिक काल में वन्यजीव कानून के कारण उपयोग वर्जित। ऊनी कम्बल उचित विकल्प।

5रेशमी आसन

तंत्रसार: देवी-साधना और लक्ष्मी-साधना के लिए रेशम का आसन विशेष।

वर्जित आसन (मंत्र-सिद्धि में)

  • प्लास्टिक, रबर — पृथ्वी-ऊर्जा रुकती है, साधना में बाधा
  • सूती आसन — सिद्धि-साधना के लिए अपर्याप्त (सामान्य पूजा में चलता है)
  • नंगी जमीन — शक्ति का क्षरण

बैठने की मुद्रा

घेरण्ड संहिता: सिद्धि-साधना में 'सिद्धासन' सर्वश्रेष्ठ — एड़ी को पेरिनियम पर रखकर बैठना। पद्मासन द्वितीय। दोनों संभव न हों तो सुखासन।

महत्वपूर्ण: एक बार जो आसन चुनें — पूरे अनुष्ठान में वही रखें। आसन बदलने से साधना-क्रम टूटता है।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता (6.11-12), कुलार्णव तंत्र (15.62), तंत्रसार, मंत्रमहार्णव, घेरण्ड संहिता
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