विस्तृत उत्तर
मंत्र-सिद्धि के दौरान आसन का विशेष महत्व है — यह सामान्य पूजा से अधिक कठोर नियमों के साथ है:
तंत्रसार — सिद्धि-साधना में आसन का सिद्धांत
आसनं मंत्रसिद्ध्यर्थं विशेषेण विधीयते।
— मंत्र-सिद्धि के लिए आसन की विशेष व्यवस्था की जाती है। गलत आसन = शक्ति का क्षरण।
सिद्धि-साधना में आसन की श्रेष्ठता का क्रम
1व्याघ्रचर्म (बाघ की खाल) — शास्त्र में सर्वोत्तम
कुलार्णव तंत्र: तांत्रिक साधना में व्याघ्रचर्म सर्वश्रेष्ठ माना गया है — इसे 'शक्ति का महान संवाहक' कहा गया है। परंतु: आधुनिक काल में वन्यजीव संरक्षण कानून के कारण यह पूर्णतः निषिद्ध है — इसका उपयोग न करें।
2ऊनी आसन (कम्बल) — सर्वाधिक व्यावहारिक और उत्तम
मंत्रमहार्णव: ऊनी आसन शरीर की विद्युत-ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता। जप और ध्यान के दौरान ऊर्जा का संरक्षण करता है। यह सर्वाधिक सुरक्षित और प्रभावशाली आसन है।
3कुशासन (दर्भासन)
भगवद्गीता (6.11): कुश पर मृगचर्म, उस पर वस्त्र — यह वेद-विहित व्यवस्था है। कुश = पृथ्वी की सात्विक ऊर्जा का वाहक।
4मृगचर्म (हिरण की खाल)
शास्त्र में उल्लिखित — परंतु आधुनिक काल में वन्यजीव कानून के कारण उपयोग वर्जित। ऊनी कम्बल उचित विकल्प।
5रेशमी आसन
तंत्रसार: देवी-साधना और लक्ष्मी-साधना के लिए रेशम का आसन विशेष।
वर्जित आसन (मंत्र-सिद्धि में)
- ▸प्लास्टिक, रबर — पृथ्वी-ऊर्जा रुकती है, साधना में बाधा
- ▸सूती आसन — सिद्धि-साधना के लिए अपर्याप्त (सामान्य पूजा में चलता है)
- ▸नंगी जमीन — शक्ति का क्षरण
बैठने की मुद्रा
घेरण्ड संहिता: सिद्धि-साधना में 'सिद्धासन' सर्वश्रेष्ठ — एड़ी को पेरिनियम पर रखकर बैठना। पद्मासन द्वितीय। दोनों संभव न हों तो सुखासन।
महत्वपूर्ण: एक बार जो आसन चुनें — पूरे अनुष्ठान में वही रखें। आसन बदलने से साधना-क्रम टूटता है।





