विस्तृत उत्तर
मृगचर्म (काले हिरण का चर्म) आसन वेद-शास्त्रों में ब्रह्मचर्य, ज्ञान, वैराग्य, सिद्धि, शांति और मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वश्रेष्ठ साधना-आसन माना गया है।
शास्त्रीय विधान: शास्त्र में आसन के संदर्भ में कहा गया है — 'कौशेय कंबलम चैव अजिनम पट्ट मेव च' — मोक्ष और लक्ष्मी की कामना करने वाले को चर्म, व्याघ्र अथवा कृष्ण मृग चर्म पर बैठकर मंत्र जप करना चाहिए।
मृगचर्म के विशेष गुण: इस आसन पर बैठकर साधना करने से साधक को मोक्ष और धन की प्राप्ति होती है। इसके अलावा कीड़े-मकोड़े, रक्त विकार, वायु-पित्त विकार आदि से भी साधक की रक्षा होती है। शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और इंद्रियाँ संयमित रहती हैं।
पौराणिक महत्व: प्राचीन ऋषि-मुनि काले हिरण के चर्म पर बैठकर ध्यान और साधना करते थे। ज्ञानेश्वर महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में आसन का वर्णन करते हुए बताया — नीचे कुशासन, उस पर मृगचर्म या कंबल, उस पर धुत वस्त्र।
आधुनिक विकल्प: आजकल वन्यजीव संरक्षण कानूनों के अंतर्गत मृगचर्म आसन का उपयोग व्यावहारिक नहीं है। इसके स्थान पर काले रंग के ऊनी आसन का उपयोग किया जा सकता है।
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