विस्तृत उत्तर
नवरात्रि में ज्वारा (जौ/गेहूँ के अंकुर) बोना घटस्थापना का अभिन्न अंग है। प्रतिपदा (पहले दिन) को ज्वारा बोए जाते हैं और नवमी/दशमी को विसर्जित।
ज्वारा बोने की विधि
1सामग्री
- ▸मिट्टी का पात्र (सकोरा/कटोरा) या मिट्टी की परत
- ▸शुद्ध मिट्टी (गंगाजल से शुद्ध की हुई)
- ▸जौ (बार्ली) या गेहूँ के बीज
- ▸जल
2विधि
- ▸घटस्थापना (कलश स्थापना) के साथ ही ज्वारा बोएँ।
- ▸मिट्टी के पात्र में या कलश के चारों ओर शुद्ध मिट्टी बिछाएँ।
- ▸उस पर जौ/गेहूँ के दाने बोएँ।
- ▸ऊपर से पतली मिट्टी की परत ढकें।
- ▸जल छिड़कें।
- ▸अँधेरे स्थान (पूजा घर में कलश के पास) रखें।
3देखभाल (9 दिन)
- ▸प्रतिदिन सुबह-शाम जल छिड़कें।
- ▸सीधी धूप से बचाएँ।
- ▸9 दिन में ज्वारे 5-7 इंच लम्बे, पीले-हरे अंकुर बन जाते हैं।
4विसर्जन (नवमी/दशमी)
- ▸नवमी हवन/कन्या पूजन के बाद ज्वारे निकालें।
- ▸देवी माता को अर्पित करें।
- ▸ज्वारे परिवार के सदस्यों को प्रसाद रूप में बाँटें — टोपी/कान पर लगाएँ।
- ▸शेष ज्वारे नदी/जल में विसर्जित करें।
महत्व
- ▸ज्वारा = शक्ति/ऊर्जा का प्रतीक — जैसे बीज अंकुरित होता है, वैसे शक्ति जागृत।
- ▸ज्वारे की वृद्धि = सौभाग्य और समृद्धि का शुभ संकेत।
- ▸यदि ज्वारे हरे-पीले, सीधे उगें तो शुभ; मुरझाएँ तो अशुभ संकेत (लोक मान्यता)।
- ▸यह प्रकृति पूजा और कृषि संस्कृति का प्रतीक भी है।





