विस्तृत उत्तर
सबसे पहले एक चौड़े मुँह वाले मिट्टी के पात्र (वेदी) को पूजा स्थल पर रखा जाता है। इसमें स्वच्छ और पवित्र मिट्टी (या बालू) की एक परत बिछाई जाती है। यह पात्र और मिट्टी जीवन की उपजाऊ भूमि और सृष्टि के उद्गम का साक्षात प्रमाण हैं।
इस मिट्टी की शय्या (Bed) में सप्तधान्य (मुख्य रूप से जौ, गेहूं आदि) बोए जाते हैं।
दार्शनिक भावार्थ: बीज बोते समय साधक यह भावना करता है कि जिस प्रकार यह सुप्त बीज अंकुरित होकर पूर्णता और वृद्धि को प्राप्त करेगा, ठीक उसी प्रकार साधक के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिकता का नव-विकास होगा।
नौ दिनों तक इनमें अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में जल का सिंचन किया जाता है। दशमी के दिन उत्पन्न होने वाले हरे अंकुरों (जिन्हें 'जयंती' कहा जाता है) को ३ से ५ इंच का होने पर काटा जाता है और देवी के प्रसाद स्वरूप परिवार के सदस्यों को धारण कराया जाता है।


