विस्तृत उत्तर
एक अछीले (जटा वाले) नारियल को लाल वस्त्र या चुनरी में लपेटकर उस पर मौली बांधी जाती है। इस पूर्णतः सज्जित नारियल को कलश के मुख पर रखे पूर्णपात्र के अक्षतों के ऊपर स्थापित किया जाता है।
दिशा का ज्ञान: पारंपरिक ज्ञान के अनुसार नारियल का मुख (जिस ओर वह टहनी से जुड़ा होता है) सदैव साधक की ओर होना चाहिए।
कुछ परंपराओं में नारियल के स्थान पर पुष्पमाला से भी कलश को आच्छादित करने का विधान है।
इस प्रकार विधि-विधान से स्थापित यह कलश पूर्णता को प्राप्त होता है, जो आगामी नौ दिनों तक भगवती माँ दुर्गा की दिव्य ऊर्जा का निवास स्थान (Divine Seat) बन जाता है।





