विस्तृत उत्तर
सर्वप्रथम पूजा-स्थल को अत्यंत सावधानी से गाय के गोबर या शुद्ध जल (गंगाजल) से लीपकर या धोकर पवित्र किया जाता है। इस कृत्य से वह स्थान 'सात्विक' और ध्यान के लिए शांतिपूर्ण बन जाता है।
तदुपरांत, कुशा के आसन या ऊनी कंबल पर पूर्वाभिमुख (पूर्व दिशा की ओर मुख करके) या उत्तराभिमुख होकर बैठा जाता है।
दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात्, वातावरण की नकारात्मक और ठहरी हुई (stagnant) ऊर्जा को समूल नष्ट करने के लिए गुग्गुल (Guggula) और सिह्लक (लोबान) की धूप जलाई जाती है, जो देवी को अत्यंत प्रिय है और स्थान को पूर्णतः शुद्ध कर देती है।





