विस्तृत उत्तर
शिव पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीरसागर का मंथन किया, तो उसमें से सर्वप्रथम 'कालकूट' (हलाहल) नामक अत्यंत भयंकर विष निकला। इस विष की ज्वाला से संपूर्ण चराचर जगत, देवता और दानव जलने लगे। तब भगवान शिव ने उस महाविष का पान कर लिया। उन्होंने अपनी योगमाया से उस विष को गले से नीचे नहीं उतरने दिया और उसे अपने कंठ में ही रोक लिया।
रूपक: यह लीला शिव के लोकोपकारी और असीम करुणामयी स्वभाव को सिद्ध करती है। आध्यात्मिक दृष्टि से, जब मनुष्य ध्यान रूपी मंथन करता है, तो सर्वप्रथम उसके भीतर छिपे विकार और नकारात्मकता (विष) बाहर आते हैं।
शिव का संदेश है कि समाज और स्वयं की रक्षा के लिए इस नकारात्मकता को न तो उगलना चाहिए (जिससे दूसरों का अहित हो) और न ही निगलना चाहिए (जिससे स्वयं का पतन हो), अपितु इसे शिव की भांति कंठ में ही रोक कर निष्प्रभावी कर देना चाहिए।





