विस्तृत उत्तर
महाभारत के कर्णपर्व और शिव पुराण की रुद्र संहिता में त्रिपुरासुर वध की कथा है। तारकासुर के तीन महापराक्रमी पुत्रों — तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली — ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अंतरिक्ष में विचरने वाली तीन पुरियां (नगर) प्राप्त कीं। विश्वकर्मा ने तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण किया। इन असुरों ने वरदान मांगा था कि ये तीनों पुरियां केवल तभी नष्ट हो सकती हैं जब कोई उन्हें एक ही बाण से एक साथ बेध दे।
जब इन असुरों (त्रिपुरासुर) का आतंक देवलोक और पृथ्वी पर चरम पर पहुँच गया, तब भगवान विष्णु की योजना के अनुसार भगवान शिव ने यह कार्य अपने हाथों में लिया। सभी देवताओं ने अपनी आधी शक्ति शिव को समर्पित कर दी। पृथ्वी रथ बनी, सूर्य-चंद्र पहिए बने, और स्वयं शिव ने अपना पाशुपतास्त्र संधान किया। कार्तिक पूर्णिमा के दिन, जब तीनों पुरियां एक सीध में आईं, तब भगवान शिव ने अपने एक अचूक बाण से उन तीनों पुरियों को भस्म कर दिया और त्रिपुरासुर का वध किया। इसी महान विजय के कारण शिव को 'त्रिपुरारी' कहा जाता है।





