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विस्तृत उत्तर
दशगात्र में दिए जाने वाले पिण्ड का चौथा भाग स्वयं प्रेत द्वारा उपभोग किया जाता है। इससे उसे आंशिक क्षुधा-शांति प्राप्त होती है। यह भाग उसे पिण्डज शरीर के निर्माण की प्रक्रिया को सहने की ऊर्जा भी देता है। मृत्यु के बाद आत्मा वायुजा देह में भूख-प्यास से व्याकुल रहती है, इसलिए पिण्डदान का यह भाग उसके लिए तृप्ति का साधन माना गया है।
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