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विस्तृत उत्तर
८४-अंश सिद्धान्त में पूर्वजों से प्राप्त ५६ अंशों में पितामह, अर्थात दादा, से १५ अंश माने गए हैं। पिता के बाद पितामह दूसरी पीढ़ी है और पितृ वर्गीकरण में उन्हें रुद्र स्वरूप माना गया है। यह अंश बताता है कि यजमान के शरीर में दादा का आनुवंशिक योगदान भी महत्वपूर्ण है। इसी कारण श्राद्ध में पितामह को रुद्र स्वरूप मानकर तर्पण और पिण्डदान किया जाता है।
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