विस्तृत उत्तर
आरती का महत्व आगम शास्त्र, स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित है:
1दर्शन की पूर्णता
आरती के समय भगवान का पूर्ण दर्शन होता है — ज्योति से देव के सम्पूर्ण स्वरूप का दर्शन। विष्णु पुराण: 'आरात्रिकेण देवस्य दर्शनं सफलं भवेत्।'
2पंच आरती का महत्व
- ▸पंचदीप आरती = पाँच तत्वों का एकत्र अर्पण
- ▸एकदीप = सूर्य का प्रतीक
3पाँच इंद्रियों का समर्पण
आरती में पाँच इंद्रियाँ एकत्र होती हैं:
- ▸नेत्र — ज्योति देखना
- ▸कान — आरती गीत सुनना
- ▸नासिका — कपूर-धूप सूँघना
- ▸त्वचा — ज्योति का ताप
- ▸हाथ — घंटी बजाना
4पाप क्षय
स्कंद पुराण में कहा गया है — 'नीराजनसमं किञ्चित् पापहारि न विद्यते।' — आरती के समान पाप हरने वाला कोई दूसरा उपाय नहीं।
5पूजा की समाप्ति
आरती पूजा का अंतिम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है। इसके बाद देवी/देव की कृपा दृष्टि मानी जाती है।
आरती का नियम
दक्षिणावर्त (clockwise) — नाभि से मुकुट तक; घंटी बजाते हुए; फिर आरती को माथे से लगाएं।





