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पूजा रहस्य📜 आगम शास्त्र — आरती विधान, स्कंद पुराण, आयुर्वेद2 मिनट पठन

पूजा में कपूर क्यों जलाते हैं?

संक्षिप्त उत्तर

कपूर क्यों: आत्मा का प्रतीक — जैसे कपूर बिना अवशेष के जलता है, आत्मा परमात्मा में विलीन। अहंकार दहन। वातावरण शुद्धि (आयुर्वेद: बैक्टीरिया नाश)। आरती में शुद्ध सफेद लौ। 'कोई अवशेष नहीं' = निःस्वार्थ समर्पण।

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विस्तृत उत्तर

कपूर जलाने का महत्व आगम शास्त्र, स्कंद पुराण और आयुर्वेद में वर्णित है:

1आत्मा का प्रतीक

आगम शास्त्र में कपूर को 'आत्मा का प्रतीक' कहा गया है। जैसे कपूर पूरी तरह जलकर कोई अवशेष नहीं छोड़ता — उसी प्रकार आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है।

2अहंकार का दहन

कपूर 'अहंकार दहन' का प्रतीक है। जो साधक भक्ति की लौ में जलता है, वह 'मैं' को भूल जाता है।

3आरती का विशेष तत्व

कपूर आरती में जलाया जाता है। इसकी लौ सफेद, शुद्ध और तेज होती है — परमात्मा की शुद्ध ज्योति का प्रतीक।

4वातावरण शुद्धि

आयुर्वेद के अनुसार — कपूर जलाने से वायुमंडल शुद्ध होता है। कपूर के कण वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं।

5सुगंध

कपूर की तीव्र सुगंध नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करती है। मन एकाग्र होता है।

6कोई अवशेष नहीं

कपूर जलने के बाद कुछ नहीं बचता — 'निःस्वार्थ भाव' का प्रतीक। बिना कुछ माँगे समर्पण।

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शास्त्रीय स्रोत
आगम शास्त्र — आरती विधान, स्कंद पुराण, आयुर्वेद
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