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पूजा में किस दिशा में बैठना चाहिए?

पूजा में दिशा: पूर्व मुख — सर्वोत्तम (सूर्य की दिशा, ज्ञान और प्रकाश)। उत्तर मुख — कुबेर और ध्रुव की दिशा (दूसरा विकल्प)।

संक्षिप्त उत्तर

पूजा में दिशा: पूर्व मुख — सर्वोत्तम (सूर्य की दिशा, ज्ञान और प्रकाश)। उत्तर मुख — कुबेर और ध्रुव की दिशा (दूसरा विकल्प)। दक्षिण मुख — पितृ तर्पण में; देव पूजा में वर्जित। भाव और श्रद्धा दिशा से अधिक महत्वपूर्ण है।

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विस्तृत उत्तर

पूजा में दिशा का नियम धर्म सिंधु और मनुस्मृति में वर्णित है:

सर्वोत्तम दिशाएं

1पूर्व मुख — सर्वोत्तम

सूर्य पूर्व से उगता है। पूर्व दिशा देव, ज्ञान और प्रकाश की दिशा है। सभी देवताओं की पूजा में पूर्व मुख सर्वश्रेष्ठ।

2उत्तर मुख

कुबेर (धन के देव) और ध्रुव की दिशा। धन और स्थिरता के लिए।

देवता अनुसार दिशा

| देवता | पूजक की दिशा |

|-------|-------------|

| विष्णु, सूर्य | पूर्व मुख |

| शिव | उत्तर या पूर्व |

| दुर्गा, काली | उत्तर या पूर्व |

| पितृ तर्पण | दक्षिण मुख |

वर्जित

  • ▸दक्षिण मुख — यम की दिशा; देव पूजा में वर्जित
  • ▸पश्चिम मुख — सामान्यतः उचित नहीं

व्यावहारिक नियम

यदि मंदिर की स्थिति ऐसी हो कि पूर्व या उत्तर मुख संभव न हो — तो जो दिशा संभव हो उसमें पूजा करें। भाव और श्रद्धा दिशा से अधिक महत्वपूर्ण है।

मनुस्मृति

देवपूजनकाले तु पूर्वाभिमुखः स्थितः।' — देव पूजा के समय पूर्व मुख होकर खड़े रहें।
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

पूजा में किस दिशा में बैठना चाहिए को संदर्भ सहित समझें

पूजा में किस दिशा में बैठना चाहिए का सबसे सीधा सार यह है: पूजा में दिशा: पूर्व मुख — सर्वोत्तम (सूर्य की दिशा, ज्ञान और प्रकाश)। उत्तर मुख — कुबेर और ध्रुव की दिशा (दूसरा विकल्प)। दक्षिण मुख — पितृ तर्पण...

पूजा विधि जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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