विस्तृत उत्तर
पूजा में मन न लगना = सबसे सामान्य समस्या। गीता में अर्जुन ने भी कहा: 'मन चंचल, बलवान, दुर्दम्य — वायु को रोकने जैसा कठिन' (6.34)।
उपाय
1. नियमित समय (गीता 6.26): प्रतिदिन एक ही समय पूजा = मन को अभ्यास। शरीर-मन उस समय स्वतः पूजा-मोड में। ब्रह्म मुहूर्त = सर्वोत्तम।
2. पूजा स्थान निश्चित: एक ही स्थान = संस्कार। उस स्थान पर बैठते ही मन शांत होना शुरू। स्वच्छ, शांत, सुगन्धित।
3. शरीर तैयार: स्नान → शुद्ध वस्त्र → आसन। शरीर शुद्ध = मन शुद्ध। खाली पेट/हल्का पेट = मन शांत। भरपेट = नींद/सुस्ती।
4. प्राणायाम (पहले): पूजा से 5 मिनट पहले अनुलोम-विलोम (5-10 चक्र) = मन तुरंत शांत। यह सबसे प्रभावी उपाय।
5. संकल्प: पूजा शुरू करने से पहले: 'अगले [15/30] मिनट मैं केवल भगवान के साथ हूँ।' स्पष्ट संकल्प = मन को दिशा।
6. मंत्र जप (मुख्य सहारा): मन भटके → मंत्र पर लौटें। बार-बार भटकेगा — बार-बार लौटाएँ। यही अभ्यास। गीता 6.26: 'यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।' — जहाँ-जहाँ मन जाए, वहाँ-वहाँ से लौटाकर आत्मा में लाएँ।
7. मूर्ति/दीपक पर दृष्टि: आँखें खुली रखें → मूर्ति/दीपक ज्योत पर एकटक = त्राटक। मन भटकने का अवसर कम।
8. इन्द्रियाँ जोड़ें: पूजा में पंचेन्द्रिय = व्यस्त। आँखें=मूर्ति, कान=मंत्र/घंटी, नाक=धूप/चंदन, जीभ=प्रसाद, त्वचा=माला/फूल। सभी इन्द्रियाँ पूजा में = मन भटकने की गुंजाइश कम।
9. मोबाइल बंद/दूर: सबसे बड़ा विक्षेप = मोबाइल। पूजा में दूर/साइलेंट/बंद।
10. धैर्य: मन एक दिन में शांत नहीं होगा। महीनों/वर्षों का अभ्यास। गीता 6.35: अभ्यास+वैराग्य = मन वश। धैर्य रखें — हर दिन थोड़ा बेहतर।





