विस्तृत उत्तर
## ध्यान करते समय मन भटकता है तो क्या करें?
अर्जुन का प्रश्न — गीता में इसी का उत्तर है
गीता (6/34) में अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यही प्रश्न किया:
*'चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।'*
— हे कृष्ण! मन चंचल, उद्दंड, बलवान और दृढ़ है। उसे रोकना वायु को रोकने जैसा कठिन है।
श्रीकृष्ण का उत्तर (6/35)
*'असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।'*
— निःसंदेह मन चंचल और कठिन है — किंतु अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।
व्यावहारिक उपाय — मन भटकने पर
### 1. बिना खीझे वापस लाएं (गीता 6/26)
*'यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।'*
— मन जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ-वहाँ से धीरे-धीरे वापस लाओ। यही अभ्यास है।
खीझना नहीं — क्योंकि खीझ भी एक विचार है जो ध्यान भंग करती है।
### 2. साक्षी-भाव अपनाएं
विचार आए तो उसे 'देखें' — जैसे आकाश में बादल देखते हैं। 'यह विचार आया' — इतना जानें और छोड़ दें।
### 3. श्वास को लंगर बनाएं
जब मन भटके — श्वास पर वापस आएं। श्वास सदा वर्तमान में है — वह मन का सबसे विश्वसनीय लंगर है।
### 4. मंत्र का सहारा लें
ओम्' या 'सोऽहम्' — मन भटकते ही मंत्र को भीतर दोहराएं। यह मन को पुनः केंद्रित करता है।
### 5. अभ्यास को जारी रखें
योगसूत्र (1/12-14) — *'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।'* — अभ्यास और वैराग्य से वृत्तियों का निरोध होता है। नियमित, दीर्घकाल तक, श्रद्धापूर्वक अभ्यास ही दृढ़ होता है।





