विस्तृत उत्तर
पूजा में शुद्धता का महत्व मनुस्मृति और तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित है:
1'शुचिर्विप्र' — शुद्धता ब्राह्मण का लक्षण
मनुस्मृति में शौच (शुद्धता) को धर्म का मूल आधार कहा गया है।
2देवता की उपस्थिति
तैत्तिरीय उपनिषद: 'अशुद्धे देवाः न वसन्ति' — अशुद्ध स्थान में देवता नहीं रहते। शुद्धता देवता के आगमन का द्वार है।
3दो प्रकार की शुद्धता
- ▸बाह्य शुद्धि — स्नान, स्वच्छ वस्त्र
- ▸आंतरिक शुद्धि — मन से काम-क्रोध-लोभ का निकालना
4'मनसा वाचा कर्मणा'
पूजा मन-वचन-कर्म तीनों की शुद्धि की माँग करती है।
5व्यावहारिक
स्नान से शरीर के हानिकारक बैक्टीरिया साफ होते हैं। स्वच्छ वातावरण में एकाग्रता बेहतर होती है।
शुद्धि के सरल उपाय
- 1स्नान
- 2स्वच्छ वस्त्र
- 3हाथ-पैर धोना
- 4आचमन — तीन बार जल पीना
- 5पूजा स्थान की सफाई
यदि स्नान संभव न हो
आचमन (तीन बार जल पीना) और हाथ-पैर धोने से भी पूजा की जा सकती है।





