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पूजा नियम📜 मनुस्मृति, धर्म सिंधु — शौच नियम, तैत्तिरीय उपनिषद2 मिनट पठन

पूजा में शुद्धता क्यों जरूरी है?

संक्षिप्त उत्तर

पूजा में शुद्धता क्यों: तैत्तिरीय उपनिषद — 'अशुद्ध स्थान में देवता नहीं रहते।' दो शुद्धि: बाह्य (स्नान-वस्त्र) और आंतरिक (मन से काम-क्रोध हटाना)। स्नान संभव न हो तो आचमन + हाथ-पैर धोना पर्याप्त। मन-वचन-कर्म तीनों की शुद्धि आवश्यक।

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विस्तृत उत्तर

पूजा में शुद्धता का महत्व मनुस्मृति और तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित है:

1'शुचिर्विप्र' — शुद्धता ब्राह्मण का लक्षण

मनुस्मृति में शौच (शुद्धता) को धर्म का मूल आधार कहा गया है।

2देवता की उपस्थिति

तैत्तिरीय उपनिषद: 'अशुद्धे देवाः न वसन्ति' — अशुद्ध स्थान में देवता नहीं रहते। शुद्धता देवता के आगमन का द्वार है।

3दो प्रकार की शुद्धता

  • बाह्य शुद्धि — स्नान, स्वच्छ वस्त्र
  • आंतरिक शुद्धि — मन से काम-क्रोध-लोभ का निकालना

4'मनसा वाचा कर्मणा'

पूजा मन-वचन-कर्म तीनों की शुद्धि की माँग करती है।

5व्यावहारिक

स्नान से शरीर के हानिकारक बैक्टीरिया साफ होते हैं। स्वच्छ वातावरण में एकाग्रता बेहतर होती है।

शुद्धि के सरल उपाय

  1. 1स्नान
  2. 2स्वच्छ वस्त्र
  3. 3हाथ-पैर धोना
  4. 4आचमन — तीन बार जल पीना
  5. 5पूजा स्थान की सफाई

यदि स्नान संभव न हो

आचमन (तीन बार जल पीना) और हाथ-पैर धोने से भी पूजा की जा सकती है।

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शास्त्रीय स्रोत
मनुस्मृति, धर्म सिंधु — शौच नियम, तैत्तिरीय उपनिषद
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