विस्तृत उत्तर
वैष्णव परंपरा में 'प्रपत्ति' शरणागति का सर्वोच्च रूप है और यह भक्तियोग का चरम बिंदु माना जाता है।
प्रपत्ति' शब्द दो संस्कृत धातुओं से बना है — 'प्र' (ऊँचा / परम) और 'पद' (कदम, चरण)। अर्थात् परम की ओर कदम बढ़ाना, सर्वोच्च के चरणों में जाना — यही प्रपत्ति है।
रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत दर्शन में प्रपत्ति को मोक्ष का स्वतंत्र और सबसे तीव्र मार्ग माना गया है। रामानुज स्वामी के अनुसार जो जीव कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग में असमर्थ हो, वह सीधे प्रपत्ति के मार्ग से मोक्ष पा सकता है।
गीता के अंतिम श्लोक — 'सर्व धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' (18.66) — को रामानुज प्रपत्ति का प्रमाण-वाक्य मानते हैं।
प्रपत्ति के दो उदाहरण प्रसिद्ध हैं —
- 1मर्कट-किशोर-न्याय — बंदरी का बच्चा स्वयं उछलकर माँ को पकड़ता है। इसी प्रकार जीव अपने प्रयत्न से भगवान को पाने का प्रयास करता है — यह कर्म, ज्ञान, भक्तियोग है।
- 2मार्जार-किशोर-न्याय — बिल्ली का बच्चा निश्चिंत पड़ा रहता है और माँ स्वयं उसे उठा लेती है। इसी प्रकार जो जीव पूर्णतः भगवान पर निर्भर हो जाता है — वह प्रपत्ति है।
प्रपत्ति में जीव केवल यह स्वीकार करता है — 'मैं असहाय हूँ, आप मेरे रक्षक हैं, मेरी रक्षा करें।' — यही पाँच-छह अंगों वाली शरणागति का सार है।





