विस्तृत उत्तर
शिव पुराण और धर्मशास्त्रों में गृहस्थ और संन्यासी दोनों के लिए शिव उपासना विहित है, परंतु विधि और नियमों में स्पष्ट भेद है:
गृहस्थ की शिव उपासना
- 1षोडशोपचार पूजा (16 उपचार) — स्नान, वस्त्र, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से विधिवत पूजन।
- 2कामना सहित पूजा का अधिकार — स्वास्थ्य, संतान, धन, सुख-शांति आदि कामनाओं से पूजा कर सकते हैं।
- 3पत्नी सहित पूजा — शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा। गृहस्थ के लिए पत्नी सहित पूजन विशेष फलदायी।
- 4सामान्य नित्य पूजा — प्रतिदिन शिवलिंग पर जलाभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, 'ॐ नमः शिवाय' जप।
- 5व्रत-उपवास — सोमवार व्रत, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि व्रत।
- 6सात्विक जीवन — पूर्ण ब्रह्मचर्य अनिवार्य नहीं, संयम और सात्विकता पर्याप्त।
- 7मंदिर दर्शन, तीर्थयात्रा, कथा श्रवण — ये गृहस्थ धर्म के अंग हैं।
संन्यासी की शिव उपासना
- 1निष्काम भक्ति — केवल मोक्ष और शिव-साक्षात्कार के लिए उपासना। सांसारिक कामना सर्वथा त्याज्य।
- 2आत्मध्यान प्रधान — बाह्य पूजा कम, अंतर्ध्यान प्रधान। 'शिवोऽहम्' (मैं शिव हूं) भाव से ध्यान।
- 3पूर्ण ब्रह्मचर्य — अनिवार्य और कठोर।
- 4भस्म-रुद्राक्ष धारण — शरीर पर भस्म (त्रिपुण्ड्र) और रुद्राक्ष धारण अनिवार्य।
- 5एकाकी साधना — गुफा, वन, नदी तट या एकांत में साधना।
- 6रुद्राभिषेक, शतरुद्रीय पाठ — वैदिक विधि से रुद्र मंत्रों का विस्तृत पाठ।
- 7समाधि और योग — ध्यान, समाधि, कुण्डलिनी जागरण जैसी उच्च योग साधनाएं।
समानता
दोनों के लिए शिव-भक्ति, सत्य, अहिंसा और दया आवश्यक। शिव पुराण में कहा गया है कि शिव भक्ति भाव देखते हैं, विधि नहीं — अतः सच्चे मन से की गई पूजा गृहस्थ हो या संन्यासी, दोनों को समान फल देती है।





