विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में वसु, रुद्र और आदित्य पितरों को अधिष्ठाता देवता के रूप में तृप्त करते हैं। जब यजमान विशिष्ट गोत्र और नाम का उच्चारण करके वसु-रुद्र-आदित्य स्वरूप कहकर तर्पण या पिण्डदान करता है, तो ये ब्रह्माण्डीय देव उस आहुति को ग्रहण करते हैं। नन्द पण्डित के अनुसार देवदत्त आदि नाम उस विशिष्ट जीवात्मा के परिचायक या पते हैं, जबकि वसु, रुद्र और आदित्य उन जीवात्माओं के अधीक्षक देव हैं। ये देव मन्त्र, गोत्र-नाम और संकल्प के सूक्ष्म तंत्र से उस विशिष्ट आत्मा तक तृप्ति पहुँचा देते हैं। यदि पूर्वज देव योनि में है तो अन्न अमृत बनता है, असुर योनि में है तो भोग-विलास बनता है, पशु योनि में है तो तृण बनता है, सरीसृप योनि में है तो वायु बनता है और मानव योनि में है तो अन्न-जल, आरोग्य और धन-धान्य के रूप में प्राप्त होता है।
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