विस्तृत उत्तर
श्राद्धकर्ता का वस्त्र शास्त्रों में स्पष्ट रूप से निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्धकर्ता, जो मुख्यतः ज्येष्ठ पुत्र या दौहित्र होता है, को पूर्णतः शुद्ध होकर श्वेत धोती धारण करनी चाहिए। स्पष्ट उत्तर यह है कि श्राद्धकर्ता को श्वेत धोती पहननी चाहिए।
वस्त्र का विवरण देखें तो यह श्वेत धोती होनी चाहिए, अर्थात् सफेद रंग की धोती जो शुद्ध और स्वच्छ हो। श्वेत रंग का चयन इसलिए किया गया क्योंकि सफेद रंग पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक है, और शास्त्रों में श्राद्ध के लिए इसे विशेष माना गया है। श्राद्धकर्ता कौन हो सकता है, इस पर भी शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है। मुख्यतः ज्येष्ठ पुत्र, या दौहित्र अर्थात् पुत्री का पुत्र, श्राद्धकर्ता हो सकता है।
पूर्व-तैयारी में दो बातों का ध्यान रखना चाहिए। पहली बात है पूर्ण शुद्धि, क्योंकि शास्त्र कहते हैं पूर्णतः शुद्ध होकर, अर्थात् स्नान आदि से पवित्र होकर। दूसरी बात है शुद्ध वस्त्र, अर्थात् स्वच्छ धुली हुई धोती जिसमें कोई दाग-धब्बा न हो। अन्य अनिवार्य विधान भी हैं जिनका ध्यान रखना आवश्यक है। पवित्री धारण करना अनिवार्य है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार अनामिका अंगुली में कुशा घास से निर्मित पवित्री अर्थात् अंगूठी धारण करना अनिवार्य है। पवित्री क्या है तो यह कुशा घास से बनी अंगूठी होती है। इसे कहाँ धारण करना है तो अनामिका अंगुली अर्थात् ring finger में। इसका कारण यह है कि यह शुद्धता का प्रतीक है और शास्त्र-निर्धारित अनिवार्य चिह्न है।
यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊ की स्थिति भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। श्राद्ध विधि में यज्ञोपवीत की स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पितरों का तर्पण करते समय जनेऊ को दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखा जाता है, और इस अवस्था को अपसव्य कहा जाता है। श्राद्ध के समय कर्ता की पूर्ण तैयारी में पाँच बातें शामिल हैं। पहले स्नान करना है, अर्थात् पूर्ण शुद्ध स्नान। फिर श्वेत धोती धारण करनी है। फिर पवित्री अनामिका में पहननी है। फिर जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखना है। और अंत में दक्षिण मुख होकर बैठना है।
यह सब इसलिए आवश्यक है क्योंकि श्राद्ध केवल कुछ मंत्रों का उच्चारण नहीं है, बल्कि यह पूर्ण आध्यात्मिक यज्ञ है, जिसमें काल, दिशा, सामग्री और मन की शुद्धि का अत्यंत महत्त्व है। शास्त्रीय स्रोत के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। वस्त्र बाह्य शुद्धता का प्रतीक है, और श्वेत धोती कर्ता की पवित्र भावना का बाह्य रूप है। निष्कर्षतः श्राद्धकर्ता, जो ज्येष्ठ पुत्र या दौहित्र होता है, को पूर्णतः शुद्ध होकर श्वेत धोती धारण करनी चाहिए, साथ ही अनामिका अंगुली में कुशा घास से बनी पवित्री और जनेऊ अपसव्य अवस्था में पहनना चाहिए।
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