विस्तृत उत्तर
श्रीविद्या साधना — तंत्र की सर्वोच्च और सम्पूर्ण साधना-पद्धति:
श्रीविद्या की परिभाषा
श्री = त्रिपुरसुंदरी। विद्या = वह ज्ञान जिससे उन्हें प्राप्त किया जाए।
श्रीविद्या = त्रिपुरसुंदरी की पूर्ण उपासना-पद्धति — जिसमें मंत्र, यंत्र, और तंत्र तीनों का समन्वय है।
श्रीविद्या के तीन आधार
1श्री मंत्र (पंचदशाक्षरी / षोडशी)
परशुराम कल्पसूत्र: श्रीविद्या का मूल मंत्र — 'पंचदशाक्षरी' — 15 बीज-अक्षरों से बना। यह तीन खण्डों में है:
- ▸वाग्भव खण्ड (5 अक्षर) — सरस्वती अंश
- ▸काम राज खण्ड (6 अक्षर) — लक्ष्मी अंश
- ▸शक्ति खण्ड (4 अक्षर) — काली अंश
तीनों खण्डों का संयोग = सम्पूर्ण शक्ति।
2श्री यंत्र (श्री चक्र)
भावनोपनिषद: श्री यंत्र = ब्रह्माण्ड का नक्शा। 9 त्रिकोण (5 शक्ति + 4 शिव), 43 छोटे त्रिकोण, 8-पंखुड़ी कमल, 16-पंखुड़ी कमल, 3 वृत्त, और भूपुर। केंद्र-बिंदु = त्रिपुरसुंदरी का निवास।
3नवावरण पूजा
नित्याषोडशिका: श्री यंत्र के 9 आवरणों की क्रमशः पूजा। प्रत्येक आवरण में अलग देवियाँ। यह पूजा पूर्ण करने पर साधक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तियों का आह्वान करता है।
श्रीविद्या के सम्प्रदाय
- ▸काली-क्रम — कश्मीर शैव
- ▸हादि विद्या — अभिनवगुप्त परंपरा
- ▸कादि विद्या — भास्कर-राय परंपरा (दक्षिण भारत में प्रचलित)
श्रीविद्या दीक्षा — अनिवार्य
परशुराम कल्पसूत्र: श्रीविद्या बिना दीक्षा के ग्राह्य नहीं। सम्पूर्ण श्रीविद्या = तीन दीक्षा-स्तर:
- 1समय-दीक्षा — प्रारंभिक
- 2पूर्णाभिषेक — मध्यम
- 3महापूर्णाभिषेक — उच्चतम
श्रीविद्या साधना का फल
ललितासहस्रनाम: सौंदर्य, विद्या, धन, स्वास्थ्य, पुत्र, और अंततः मोक्ष। श्रीविद्या 'सर्वार्थ-साधक विद्या' है — सभी पुरुषार्थों की दाता।