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तंत्र साधना📜 परशुराम कल्पसूत्र, तंत्रराज तंत्र, भावनोपनिषद, ललितासहस्रनाम (ब्रह्माण्ड पुराण), नित्याषोडशिका तंत्र2 मिनट पठन

श्रीविद्या साधना क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

श्रीविद्या = त्रिपुरसुंदरी की पूर्ण उपासना — मंत्र + यंत्र + तंत्र का समन्वय। तीन आधार: पंचदशाक्षरी (वाग्भव + कामराज + शक्ति खण्ड), श्री यंत्र (9 त्रिकोण + ब्रह्माण्ड-नक्शा), नवावरण पूजा। दीक्षा अनिवार्य: समय → पूर्णाभिषेक → महापूर्णाभिषेक। फल: सौंदर्य-विद्या-धन-मोक्ष — सभी पुरुषार्थ।

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विस्तृत उत्तर

श्रीविद्या साधना — तंत्र की सर्वोच्च और सम्पूर्ण साधना-पद्धति:

श्रीविद्या की परिभाषा

श्री = त्रिपुरसुंदरी। विद्या = वह ज्ञान जिससे उन्हें प्राप्त किया जाए।

श्रीविद्या = त्रिपुरसुंदरी की पूर्ण उपासना-पद्धति — जिसमें मंत्र, यंत्र, और तंत्र तीनों का समन्वय है।

श्रीविद्या के तीन आधार

1श्री मंत्र (पंचदशाक्षरी / षोडशी)

परशुराम कल्पसूत्र: श्रीविद्या का मूल मंत्र — 'पंचदशाक्षरी' — 15 बीज-अक्षरों से बना। यह तीन खण्डों में है:

  • वाग्भव खण्ड (5 अक्षर) — सरस्वती अंश
  • काम राज खण्ड (6 अक्षर) — लक्ष्मी अंश
  • शक्ति खण्ड (4 अक्षर) — काली अंश

तीनों खण्डों का संयोग = सम्पूर्ण शक्ति।

2श्री यंत्र (श्री चक्र)

भावनोपनिषद: श्री यंत्र = ब्रह्माण्ड का नक्शा। 9 त्रिकोण (5 शक्ति + 4 शिव), 43 छोटे त्रिकोण, 8-पंखुड़ी कमल, 16-पंखुड़ी कमल, 3 वृत्त, और भूपुर। केंद्र-बिंदु = त्रिपुरसुंदरी का निवास।

3नवावरण पूजा

नित्याषोडशिका: श्री यंत्र के 9 आवरणों की क्रमशः पूजा। प्रत्येक आवरण में अलग देवियाँ। यह पूजा पूर्ण करने पर साधक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तियों का आह्वान करता है।

श्रीविद्या के सम्प्रदाय

  • काली-क्रम — कश्मीर शैव
  • हादि विद्या — अभिनवगुप्त परंपरा
  • कादि विद्या — भास्कर-राय परंपरा (दक्षिण भारत में प्रचलित)

श्रीविद्या दीक्षा — अनिवार्य

परशुराम कल्पसूत्र: श्रीविद्या बिना दीक्षा के ग्राह्य नहीं। सम्पूर्ण श्रीविद्या = तीन दीक्षा-स्तर:

  1. 1समय-दीक्षा — प्रारंभिक
  2. 2पूर्णाभिषेक — मध्यम
  3. 3महापूर्णाभिषेक — उच्चतम

श्रीविद्या साधना का फल

ललितासहस्रनाम: सौंदर्य, विद्या, धन, स्वास्थ्य, पुत्र, और अंततः मोक्ष। श्रीविद्या 'सर्वार्थ-साधक विद्या' है — सभी पुरुषार्थों की दाता।

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शास्त्रीय स्रोत
परशुराम कल्पसूत्र, तंत्रराज तंत्र, भावनोपनिषद, ललितासहस्रनाम (ब्रह्माण्ड पुराण), नित्याषोडशिका तंत्र
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