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विस्तृत उत्तर
सृष्टि शुरू होने से पहले न पृथ्वी थी, न सूर्य, न चंद्रमा, न तारे और न दिशाओं का कोई अर्थ था। कथा में इस अवस्था को पूर्ण शून्य और प्रकृति की साम्यावस्था कहा गया है, जहाँ सत्त्व, रजस और तमस तीनों गुण शांत संतुलन में थे। सब जीव और लोक अपने सूक्ष्म कारण रूप में परम चेतना में लीन थे। उसी शांति में भगवान विष्णु योगनिद्रा में स्थित थे और सृष्टि का बीज उनके संकल्प में सुरक्षित था।
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