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सनातन संप्रदाय⏱ 2 मिनट पठन

स्वामीनारायण संप्रदाय की पूजा पद्धति क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

स्वामीनारायण संप्रदाय में — नित्य मूर्ति-दर्शन, वचनामृत का सत्संग, अक्षर-ब्रह्म (गुरु) की उपासना और कठोर नैतिक आचार-संहिता केंद्रीय है। BAPS इसकी प्रमुख शाखा है।

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विस्तृत उत्तर

स्वामीनारायण संप्रदाय की स्थापना सहजानंद स्वामी (1781-1830) ने की थी। इसका दर्शन 'अक्षरपुरुषोत्तम दर्शन' कहलाता है जिसमें पाँच शाश्वत तत्व माने जाते हैं — जीव, ईश्वर, माया, अक्षरब्रह्म और परब्रह्म (स्वामीनारायण)।

पूजा-पद्धति की मुख्य विशेषताएं —

पहली — नित्य दर्शन और दर्शन-सेवा। प्रतिदिन प्रातःकाल मूर्तियों के लिए मंगला-आरती से आरंभ होकर शयन-आरती तक पाँच-छह बार आरती होती है।

दूसरी — मूर्ति-उपासना केंद्रीय है। स्वामीनारायण के मंदिरों में अत्यंत विस्तृत और भव्य मूर्तियाँ होती हैं। भक्त मूर्ति के दर्शन मात्र को पवित्र और मुक्तिदायक मानते हैं।

तीसरी — सत्संग की अनिवार्यता। स्वामीनारायण के ग्रंथ 'वचनामृत' का नित्य पाठ सत्संग का अभिन्न अंग है। यह सहजानंद स्वामी के वचनों का संकलन है।

चौथी — गुरु-परंपरा का महत्व। BAPS (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम संस्था) में गुरु (अक्षर ब्रह्म के रूप में) की उपासना अनिवार्य मानी जाती है। वर्तमान में संस्था के संत ही इस परंपरा के वाहक हैं।

पाँचवीं — नैतिक आचार-संहिता। नशा, मांसाहार, चोरी आदि का पूर्ण त्याग इस संप्रदाय की शर्त है।

स्वामीनारायण संप्रदाय के मंदिर — अक्षरधाम (दिल्ली, गांधीनगर) विश्व के सबसे भव्य हिंदू मंदिरों में गिने जाते हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

स्वामीनारायण संप्रदाय की पूजा पद्धति क्या है को संदर्भ सहित समझें

स्वामीनारायण संप्रदाय की पूजा पद्धति क्या है का सबसे सीधा सार यह है: स्वामीनारायण संप्रदाय में — नित्य मूर्ति-दर्शन, वचनामृत का सत्संग, अक्षर-ब्रह्म (गुरु) की उपासना और कठोर नैतिक आचार-संहिता केंद्रीय है। BAPS इसकी प्रमुख शाखा है।

सनातन संप्रदाय जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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उत्तर पढ़ते समय यह देखें कि उसमें नियम, अपवाद और व्यवहारिक संदर्भ साफ हैं या नहीं।

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