विस्तृत उत्तर
लिंगायत (वीरशैव) संप्रदाय कर्नाटक का एक प्रमुख शैव संप्रदाय है। इसकी स्थापना का श्रेय बसवण्ण (बसवेश्वर, 12वीं शताब्दी) को दिया जाता है। इनकी शिव-पूजा पद्धति पारंपरिक शैव पूजा से भिन्न और अत्यंत अनूठी है।
लिंगायत पूजा की मुख्य विशेषताएं —
पहली — इष्टलिंग धारण। लिंगायत प्रत्येक व्यक्ति अपने गले या छाती पर एक छोटा-सा शिवलिंग (इष्टलिंग) धारण करता है। यह व्यक्तिगत उपासना का प्रतीक है — शिव सदा साथ हैं।
दूसरी — अंग-पूजन। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद इष्टलिंग को बाईं हथेली पर रखकर उसकी षोडशोपचार से पूजा की जाती है। यह 'अंग-पूजन' कहलाती है।
तीसरी — मंदिर की अनिवार्यता नहीं। लिंगायत मत में शिव की पूजा के लिए किसी बाहरी मंदिर की आवश्यकता नहीं — स्वयं का शरीर और इष्टलिंग ही शिव-मंदिर है।
चौथी — वचनकारों की शिक्षा। बसवण्ण और अन्य वचनकार संतों के 'वचन' (शरण-वाणी) लिंगायत पूजा-पद्धति के प्रमुख ग्रंथ हैं।
पाँचवीं — जाति-भेद का विरोध। लिंगायत मत में जाति के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार किया गया है — सभी शरण (भक्त) शिव के समान हैं।
मृत्यु के बाद लिंगायत अपने मृतक को दफनाते हैं — दाह-संस्कार नहीं करते।





