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सनातन संप्रदाय⏱ 2 मिनट पठन

लिंगायत संप्रदाय में शिव पूजा कैसे होती है?

लिंगायत प्रत्येक व्यक्ति गले में इष्टलिंग धारण करते हैं और प्रतिदिन उसकी अंग-पूजन करते हैं।

संक्षिप्त उत्तर

लिंगायत प्रत्येक व्यक्ति गले में इष्टलिंग धारण करते हैं और प्रतिदिन उसकी अंग-पूजन करते हैं। मंदिर की आवश्यकता नहीं — स्वयं का शरीर ही शिव-मंदिर है।

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विस्तृत उत्तर

लिंगायत (वीरशैव) संप्रदाय कर्नाटक का एक प्रमुख शैव संप्रदाय है। इसकी स्थापना का श्रेय बसवण्ण (बसवेश्वर, 12वीं शताब्दी) को दिया जाता है। इनकी शिव-पूजा पद्धति पारंपरिक शैव पूजा से भिन्न और अत्यंत अनूठी है।

लिंगायत पूजा की मुख्य विशेषताएं —

पहली — इष्टलिंग धारण। लिंगायत प्रत्येक व्यक्ति अपने गले या छाती पर एक छोटा-सा शिवलिंग (इष्टलिंग) धारण करता है। यह व्यक्तिगत उपासना का प्रतीक है — शिव सदा साथ हैं।

दूसरी — अंग-पूजन। प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद इष्टलिंग को बाईं हथेली पर रखकर उसकी षोडशोपचार से पूजा की जाती है। यह 'अंग-पूजन' कहलाती है।

तीसरी — मंदिर की अनिवार्यता नहीं। लिंगायत मत में शिव की पूजा के लिए किसी बाहरी मंदिर की आवश्यकता नहीं — स्वयं का शरीर और इष्टलिंग ही शिव-मंदिर है।

चौथी — वचनकारों की शिक्षा। बसवण्ण और अन्य वचनकार संतों के 'वचन' (शरण-वाणी) लिंगायत पूजा-पद्धति के प्रमुख ग्रंथ हैं।

पाँचवीं — जाति-भेद का विरोध। लिंगायत मत में जाति के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार किया गया है — सभी शरण (भक्त) शिव के समान हैं।

मृत्यु के बाद लिंगायत अपने मृतक को दफनाते हैं — दाह-संस्कार नहीं करते।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

लिंगायत संप्रदाय में शिव पूजा कैसे होती है को संदर्भ सहित समझें

लिंगायत संप्रदाय में शिव पूजा कैसे होती है का सबसे सीधा सार यह है: लिंगायत प्रत्येक व्यक्ति गले में इष्टलिंग धारण करते हैं और प्रतिदिन उसकी अंग-पूजन करते हैं। मंदिर की आवश्यकता नहीं — स्वयं का शरीर ही शिव-मंदिर है।

सनातन संप्रदाय जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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