विस्तृत उत्तर
केतकी (केवड़ा) का फूल अत्यंत सुगंधित और सुंदर होता है, फिर भी शिव पूजा में इसे चढ़ाना पूर्णतः वर्जित है। इसके पीछे शिव पुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है।
एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में विवाद हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। उसी समय एक विराट ज्योतिर्मय शिवलिंग प्रकट हुआ। यह निश्चय हुआ कि जो इस अनंत शिवलिंग का आदि या अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। भगवान विष्णु नीचे की ओर गए और भगवान ब्रह्मा ऊपर की ओर। भगवान विष्णु लौट आए और स्वीकार किया कि वे अंत नहीं खोज पाए। किंतु ब्रह्माजी ने आकर झूठ बोला कि उन्होंने शिवलिंग का ऊपरी छोर खोज लिया। उन्होंने रास्ते में मिले केतकी के फूल को अपना साक्षी बना लिया और केतकी ने भी इस झूठ में ब्रह्माजी का साथ दिया।
जब स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए, तो उन्हें सत्य ज्ञात था। क्रोध में उन्होंने ब्रह्माजी का पाँचवाँ सिर काट दिया और केतकी के फूल को श्राप दिया कि आज से मेरी पूजा में तू कभी स्वीकार नहीं की जाएगी। इसी कारण शिवलिंग पर केतकी का फूल चढ़ाना शास्त्रविरुद्ध है और इसे दोष का कारण माना जाता है।




