विस्तृत उत्तर
गणेश जी को दूर्वा (दूब घास) चढ़ाने की परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा है जो मुद्गल पुराण में वर्णित है। प्राचीनकाल में अनलासुर नामक एक महाभयंकर राक्षस था जो साधु-संतों और देवताओं को जीवित ही निगल जाता था। सभी देवता भयभीत हो गए। इंद्र भी उसे हरा नहीं सके। तब समस्त देवता भगवान शिव के पास गए, शिवजी ने कहा कि केवल गणेश ही इस राक्षस का वध कर सकते हैं।
देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने विशाल रूप धारण कर अनलासुर को निगल लिया। किंतु उस अग्निस्वरूप राक्षस को निगलने से गणेश जी के उदर में भीषण जलन होने लगी। कोई भी उपाय काम नहीं आया। तब महर्षि कश्यप ने 21 दूर्वा की गाँठें बनाकर भगवान गणेश को अर्पित कीं। गणेश जी ने उन्हें ग्रहण किया और उनकी जलन शांत हो गई। तब से यह परंपरा चली आई कि गणेश जी को 21 दूर्वा की गाँठें चढ़ाई जाती हैं।
दूर्वा शब्द 'दूः' (दूरस्थ) और 'अवम्' (पास लाने वाला) से बना है — अर्थात् जो गणेश की दिव्य शक्तियों को पास लाती है। कोमल, हरी दूर्वा जिसमें ऊपर तीन या पाँच पत्तियाँ हों, सर्वोत्तम मानी जाती है। विषम संख्या में — 3, 5, 7, 11 या 21 — दूर्वा अर्पित करनी चाहिए।



