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अंत्येष्टि संस्कार📜 गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, अंत्येष्टि पद्धति1 मिनट पठन

तेरहवीं का कर्म कैसे करें विधि सहित

संक्षिप्त उत्तर

13वें दिन: शुद्धि स्नान → गृह शुद्धि (गंगाजल, कपूर) → हवन → ब्राह्मण/गरीब भोज → दान (वस्त्र/अन्न) → पगड़ी (नया मुखिया) → सामान्य जीवन। कुल पुरोहित से कराएं। कुछ विद्वान: तेरहवीं=सामाजिक; शास्त्रीय=12वें दिन।

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विस्तृत उत्तर

तेरहवीं (13वां दिन) = सूतक समाप्ति, शुद्धि, प्रेत का पितरों में विलय।

विधि (सामान्य)

  1. 1शुद्धि स्नान — सभी परिजन प्रातः स्नान।
  2. 2गृह शुद्धि — घर साफ, गंगाजल छिड़काव, कपूर/धूप।
  3. 3हवन — शुद्धि हवन (यदि संभव)।
  4. 4पिंडदान — प्रेत पिंड को पितृ पिंडों में मिलाना (सपिंडीकरण — 12वें दिन किया जाता है; तेरहवीं = शुद्धि)।
  5. 5ब्राह्मण भोज — ब्राह्मण/पुरोहित को भोजन + दान।
  6. 6गरीब भोज — गरीबों/जरूरतमंदों को भोजन।
  7. 7दान — वस्त्र, अन्न, बर्तन, बिस्तर — मृतक के नाम से।
  8. 8पगड़ी — मुखिया/ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी पहनाना = अब वह परिवार प्रमुख।
  9. 9सामान्य जीवन — तेरहवीं के बाद सामान्य दिनचर्या पुनः आरंभ।

ध्यान दें: विस्तृत विधि कुल पुरोहित से कराएं। क्षेत्र/कुल अनुसार भिन्न। एक विद्वान का मत: 'शास्त्रों में तेरहवीं का विधान नहीं — 12 दिन (द्वादशाह) तक ही कर्म है। तेरहवीं = सामाजिक परंपरा।'

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण, धर्मसिंधु, अंत्येष्टि पद्धति
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