विस्तृत उत्तर
तंत्र शास्त्र में 'कुल पूजा' (कौलाचार) और 'समय पूजा' (समयाचार) दो प्रमुख उपासना पद्धतियाँ हैं। ये विशेषतः श्रीविद्या (त्रिपुरसुन्दरी) उपासना की दो शाखाएँ हैं।
समय पूजा (समयाचार)
1स्वरूप
समयाचार = आन्तरिक उपासना। इसमें शरीर के भीतर ही षट्चक्रों में देवी की पूजा की जाती है। कोई बाह्य द्रव्य, यंत्र या बाह्य क्रिया की आवश्यकता नहीं।
2विशेषताएँ
- ▸ध्यान-प्रधान साधना
- ▸कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार से सहस्रार तक ले जाना
- ▸पूर्णतः सात्विक — पंचमकार का कोई स्थान नहीं
- ▸शंकराचार्य परम्परा इसी को श्रेष्ठ मानती है
- ▸'सौन्दर्यलहरी' (शंकराचार्य) समयाचार का प्रमुख ग्रंथ
3साधक
सामान्यतः ब्राह्मण और सन्यासी परम्परा में प्रचलित। गृहस्थों में भी सात्विक साधक इसे अपनाते हैं।
कुल पूजा (कौलाचार)
4स्वरूप
कौलाचार = बाह्य और आन्तरिक दोनों उपासना। इसमें यंत्र, मंत्र, मूर्ति, द्रव्य — सभी बाह्य साधनों के साथ आन्तरिक भाव भी समाहित।
5विशेषताएँ
- ▸बाह्य पूजा-प्रधान (यंत्र, हवन, द्रव्य)
- ▸पंचमकार (पाँच 'म') सम्मिलित हो सकते हैं
- ▸कुल = परिवार/परम्परा — गुरु-शिष्य कुल-परम्परा में साधना
- ▸कुलार्णव तंत्र इसका प्रमुख ग्रंथ
- ▸भोग और मोक्ष दोनों का समन्वय
6साधक
गृहस्थ साधकों में अधिक प्रचलित। दीक्षित कुल-परम्परा के साधक।
मुख्य अंतर
| विषय | समय पूजा (समयाचार) | कुल पूजा (कौलाचार) |
|---|---|---|
| स्थान | शरीर के भीतर (चक्रों में) | बाह्य + आन्तरिक दोनों |
| विधि | ध्यान, कुंडलिनी योग | यंत्र पूजा, हवन, द्रव्य |
| पंचमकार | नहीं | सम्भव (गुरु-निर्देश) |
| प्रकृति | पूर्णतः सात्विक | सात्विक-राजसिक मिश्रित |
| ग्रंथ | सौन्दर्यलहरी | कुलार्णव तंत्र |
| लक्ष्य | मोक्ष प्रधान | भोग + मोक्ष |
समन्वय दृष्टि
उच्चकोटि के साधक दोनों को एक मानते हैं — बाहर कौल, भीतर समय। अभिनवगुप्त (तंत्रालोक) ने कहा — 'कुल और समय में कोई वास्तविक भेद नहीं — दोनों का चरम लक्ष्य शिव-शक्ति ऐक्य ही है।'