विस्तृत उत्तर
तंत्र शास्त्र में 'लता साधना' एक गोपनीय और उच्चकोटि की तांत्रिक साधना है जो कौल/वामाचार परम्परा का अंग है।
लता शब्द का अर्थ
तांत्रिक परिभाषा में 'लता' = स्त्री/शक्ति। जैसे लता वृक्ष का आश्रय लेकर ऊपर चढ़ती है, वैसे ही शक्ति (स्त्री तत्व) साधक को ऊर्ध्वगामी बनाती है। कुलार्णव तंत्र में शक्ति को 'लता' कहा गया है।
लता साधना का सिद्धांत
1शक्ति-सहचर साधना
लता साधना में साधक एक दीक्षित शक्ति (भैरवी) के साहचर्य में साधना करता है। यह पंचमकार साधना का अंग है जिसमें पाँचवाँ मकार (मैथुन) सम्मिलित है।
2प्रतीकात्मक और यथार्थ — दो स्तर
- ▸दक्षिणाचार में: लता साधना पूर्णतः प्रतीकात्मक है — मानसिक भाव से शक्ति का ध्यान
- ▸वामाचार/कौलाचार में: यथार्थ स्तर पर — दीक्षित भैरवी के साथ विशिष्ट तांत्रिक क्रिया
3कुलार्णव तंत्र का निर्देश
यह साधना 'वीराचार' श्रेणी में आती है। केवल 'वीर भाव' के साधक ही इसके अधिकारी हैं। 'पशु भाव' के साधकों के लिए यह पूर्णतः वर्जित है।
लता साधना का उद्देश्य
- ▸काम ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन (कुंडलिनी जागरण)
- ▸वासना पर विजय — वासना को साधना में रूपांतरित करना
- ▸शिव-शक्ति ऐक्य का प्रत्यक्ष अनुभव
- ▸इन्द्रिय-जय और आत्म-साक्षात्कार
अनिवार्य शर्तें
- ▸गुरु-दीक्षा अनिवार्य — बिना गुरु असम्भव
- ▸वासना-रहित भाव — कामुकता = पतन
- ▸दीक्षित भैरवी का होना अनिवार्य
- ▸पूर्ण ब्रह्मचर्य का पूर्वाभ्यास
- ▸गोपनीयता अनिवार्य
गम्भीर चेतावनी
महानिर्वाण तंत्र: बिना गुरु-दीक्षा और उचित अधिकार के लता साधना करना = पतन का मार्ग। यह साधना बहुत से तथाकथित तांत्रिकों द्वारा दुरुपयोग की गई है। वास्तविक लता साधना अत्यन्त दुर्लभ और गोपनीय है।
वैकल्पिक दृष्टिकोण
अनेक विद्वानों के अनुसार कलियुग में लता साधना मानसिक (प्रतीकात्मक) रूप में ही करनी चाहिए — यथार्थ रूप में नहीं।