विस्तृत उत्तर
तंत्र साधना में ध्यान — सामान्य ध्यान से गहरी और विशिष्ट प्रक्रिया:
तंत्रालोक (अभिनवगुप्त) — तांत्रिक ध्यान का सिद्धांत
भावना यत्र देवस्य स्पष्टं सा ध्यानमुच्यते।
तद्विना मंत्रजपश्च निःफलो भवति ध्रुवम्।।'
— जहाँ देवता की स्पष्ट भावना हो — वही ध्यान है। उसके बिना मंत्र-जप निश्चित रूप से निष्फल है।
तंत्र में ध्यान की विशेषता
सामान्य ध्यान = मन को शांत करना। तांत्रिक ध्यान = देवता के स्वरूप को अपने भीतर जागृत करना — 'देवता बनकर जपना'।
तंत्र साधना में ध्यान की पाँच विधियाँ
1देवता-स्वरूप ध्यान (ध्यान श्लोक से)
शारदातिलक: प्रत्येक तांत्रिक मंत्र के साथ एक 'ध्यान-श्लोक' होता है — जो देवता के सटीक स्वरूप का वर्णन करता है। जप से पूर्व उस श्लोक को पढ़कर — देवता का स्वरूप मन में जीवंत करें। उदाहरण: काली का ध्यान — 'श्यामवर्णा, दश-भुजा, मुण्डमाला...' — इसे आँखें बंद करके मन में साकार करें।
2यंत्र-ध्यान
तंत्रालोक: तांत्रिक साधना में देवता का यंत्र (geometric diagram) — श्री यंत्र, काली यंत्र आदि — के बिंदु पर दृष्टि स्थिर करें। यंत्र = देवता का ऊर्जा-रूप। यंत्र के केंद्र-बिंदु पर ध्यान = देवता की मूल शक्ति पर ध्यान।
3मंत्र-नाद ध्यान
कुलार्णव (15.55): जप के साथ — मंत्र की नाद-ध्वनि को भीतर से सुनें। बीज मंत्र का अनुस्वार (ं) — उसकी गूंज मस्तक से रीढ़ तक अनुभव करें। यह 'नाद-ब्रह्म' ध्यान है।
4चक्र-ध्यान (विशिष्ट तांत्रिक विधि)
महानिर्वाण तंत्र: प्रत्येक बीज मंत्र एक विशेष चक्र से जुड़ा है — जप के साथ उस चक्र पर ध्यान केंद्रित करें। जैसे — 'ह्रीं' जपते समय हृदय-चक्र (अनाहत) पर, 'ॐ' जपते समय आज्ञा-चक्र पर।
5'देवता=स्वयं' भाव (सर्वोच्च तांत्रिक ध्यान)
तंत्रालोक: उन्नत साधना में — 'मैं देवता हूँ' का भाव करके जप करें। 'अहं काली', 'अहं शिवः' — यह अहंकार-भाव नहीं, आत्म-देवता-अभेद-भाव है। यह सर्वोच्च तांत्रिक ध्यान है।
ध्यान से पहले — प्राणायाम
घेरण्ड संहिता: जप से पूर्व 3-5 अनुलोम-विलोम — मन को तत्काल स्थिर करने का सबसे प्रभावी उपाय।