विस्तृत उत्तर
तंत्र साधना में सिद्धि-प्राप्ति की सम्पूर्ण प्रक्रिया:
महानिर्वाण तंत्र — सिद्धि की परिभाषा
साधनात् सिद्धिरुत्पन्ना मंत्रशक्तेः प्रसादतः।
साधकस्य च पात्रत्वाद् गुरोः कृपाबलेन च।।'
— साधना से, मंत्र-शक्ति की कृपा से, साधक की पात्रता से, और गुरु की कृपा-शक्ति से — सिद्धि उत्पन्न होती है। यह चार कारकों का संयोग है।
तंत्र में सिद्धि के प्रकार
1मंत्र-सिद्धि (प्रथम और आधारभूत)
कुलार्णव: मंत्र-सिद्धि = जब मंत्र जपते ही देवता की उपस्थिति अनुभव हो, मंत्र 'जीवित' लगे। इसके बाद ही अन्य सिद्धियाँ आती हैं।
2अष्टसिद्धियाँ (योगसूत्र 3.16-55 + तंत्र)
- ▸अणिमा — सूक्ष्म रूप धारण
- ▸महिमा — विशाल रूप
- ▸गरिमा — अत्यंत भारी होना
- ▸लघिमा — अत्यंत हल्का होना
- ▸प्राप्ति — कहीं भी पहुँचने की शक्ति
- ▸प्राकाम्य — इच्छा-पूर्ति
- ▸ईशित्व — नियंत्रण-शक्ति
- ▸वशित्व — वशीकरण-शक्ति
3तांत्रिक विशेष सिद्धियाँ
शारदातिलक:
- ▸वाक्-सिद्धि — वचन फलित होना
- ▸दूरदर्शन — दूर की घटना देखना
- ▸भूत-ज्ञान/भविष्य-ज्ञान — त्रिकाल-दर्शन
- ▸अमरत्व — मृत्यु-भय का पूर्ण नाश
सिद्धि-प्राप्ति की प्रक्रिया — पाँच चरण
- 1दीक्षा — योग्य गुरु से
- 2पुरश्चरण — शास्त्र-निर्धारित जप-संख्या पूर्ण
- 3नियम-पालन — ब्रह्मचर्य, एकाहार, गोपनीयता
- 4ध्यान-सहित जप — भाव > संख्या
- 5गुरु-कृपा — यही सिद्धि का अंतिम द्वार
सिद्धि के संकेत (शारदातिलक)
- ▸जप में विराम न लेने की इच्छा
- ▸स्वप्न में देवता का स्पष्ट दर्शन
- ▸जप के दौरान अनायास आनंद-प्रवाह
- ▸वाणी का सत्य होना
- ▸अज्ञात ज्ञान का प्रकाश
महत्वपूर्ण
तंत्रालोक: सिद्धि का दुरुपयोग = सिद्धि का नाश। सिद्धि परीक्षण के लिए नहीं — मोक्ष और लोक-कल्याण के लिए।