विस्तृत उत्तर
तंत्र साधना में पुरश्चरण की विशेष और अनिवार्य भूमिका:
तंत्र में पुरश्चरण का विशेष महत्व (कुलार्णव तंत्र 15.56)
तंत्रे पुरश्चरणं मुख्यं मंत्रशक्तेः प्रकाशकम्।
विना पुरश्चरणेन तंत्रसिद्धिर्न जायते।।'
— तंत्र में पुरश्चरण मुख्य है — यह मंत्र-शक्ति को प्रकाशित करता है। पुरश्चरण के बिना तंत्र-सिद्धि नहीं होती।
तंत्र साधना में पुरश्चरण क्यों अधिक जरूरी — छह कारण
1तांत्रिक मंत्र अधिक शक्तिशाली = अधिक तैयारी आवश्यक
रुद्रयामल: तांत्रिक बीज मंत्र (क्रीं, हूं, फट् आदि) सामान्य मंत्रों से अधिक तीव्र ऊर्जा के वाहक हैं। अपर्याप्त तैयारी से यह ऊर्जा साधक को असंतुलित कर सकती है। पुरश्चरण = उस तीव्र ऊर्जा को सहन करने की पात्रता निर्माण।
2नाड़ी-शुद्धि
तंत्रालोक: तांत्रिक शक्ति 72,000 नाड़ियों से होकर प्रवाहित होती है। अशुद्ध नाड़ियों में यह शक्ति अवरुद्ध होती है। पुरश्चरण के दीर्घकालीन जप से नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं।
3मंत्र को 'जागृत' करना
शारदातिलक: तंत्र में मंत्र तीन अवस्थाओं में होता है — सुप्त, जागृत, और सिद्ध। पुरश्चरण मंत्र को सुप्त से जागृत अवस्था में लाता है।
4देवता का आह्वान और स्थापना
महानिर्वाण तंत्र: तांत्रिक देवता (काली, भैरव, त्रिपुरसुंदरी आदि) की शक्ति अत्यंत तीव्र है। पुरश्चरण उस शक्ति को साधक के लिए 'सौम्य' और 'वश' में करता है।
5कर्म-शुद्धि — तंत्र में विशेष आवश्यक
कुलार्णव: तांत्रिक साधना उच्च आध्यात्मिक स्तर की है। यदि साधक के कर्म (विशेषतः पूर्व-जन्म के) अशुद्ध हों — तांत्रिक शक्ति उल्टी दिशा में काम करने लगती है। पुरश्चरण पहले कर्म-शुद्धि करता है।
6गुरु-शिष्य संबंध की पुष्टि
तंत्रालोक: पुरश्चरण एक प्रकार का 'परीक्षण' भी है — जो साधक दीर्घकालीन अनुशासन और नियमों का पालन कर सकता है — वही उच्च तांत्रिक साधना का अधिकारी है।
तंत्र-पुरश्चरण की विशेषता
सामान्य पुरश्चरण से तंत्र-पुरश्चरण अधिक कठोर होता है — श्मशान-साधना, रात्रि-जप, और विशेष तांत्रिक सामग्री के साथ। केवल दीक्षित और गुरु-मार्गदर्शन में ही करें।