इन्द्र देव (ऋग्वेद) काम्य मंत्र
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्त्रप्रधनेषु च। उग्र उग्राभिरूतिभिः॥
सहस्रों प्रकार के धन का लाभ और संकट काल में संग्रामों में वीरतापूर्वक रक्षा 23।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
सहस्रों प्रकार के धन का लाभ और संकट काल में संग्रामों में वीरतापूर्वक रक्षा 23।
इस मंत्र से क्या होगा?
सहस्रों प्रकार के धन का लाभ और संकट काल में संग्रामों में वीरतापूर्वक रक्षा
जाप विधि
यज्ञीय कर्मों में अथवा प्रातःकाल पूर्ण पवित्रता के साथ जप 23।
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वं, शं, षं, सं
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
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