केतु नवग्रह मंत्र
ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।।
केतु जनित अज्ञात और संक्रामक रोगों (जैसे गंभीर एलर्जी, वायरस, तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता), जोड़ों के भयंकर दर्द, कालसर्प दोष के मारक प्रभाव (पुच्छ भाग), और अकारण शत्रुओं की वृद्धि के समूल शमन हेतु। इस
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
केतु जनित अज्ञात और संक्रामक रोगों (जैसे गंभीर एलर्जी, वायरस, तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता), जोड़ों के भयंकर दर्द, कालसर्प दोष के मारक प्रभाव (पुच्छ भाग), और अकारण शत्रुओं की वृद्धि के समूल शमन हेतु। इसके अतिरिक्त आध्यात्मिक वैराग्य, मोक्ष, गूढ़ विद्याओं (Occult sciences, Astrology) में सर्वोच्च सिद्धि और ध्यान में असीमित एकाग्रता प्राप्त करने हेतु यह वैदिक मंत्र अचूक है। 1
इस मंत्र से क्या होगा?
केतु जनित अज्ञात और संक्रामक रोगों (जैसे गंभीर एलर्जी, वायरस, तंत्रिका तंत्र की दुर्बलता), जोड़ों के भयंकर दर्द, कालसर्प दोष के मारक प्रभाव (पुच्छ भाग), और अकारण शत्रुओं की वृद्धि के समूल शमन हेतु
इसके अतिरिक्त आध्यात्मिक वैराग्य, मोक्ष, गूढ़ विद्याओं (Occult sciences, Astrology) में सर्वोच्च सिद्धि और ध्यान में असीमित एकाग्रता प्राप्त करने हेतु यह वैदिक मंत्र अचूक है
जाप विधि
मंगलवार अथवा गुरुवार को रात्रिकाल में, अश्विनी, मघा या मूल नक्षत्र में दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुख करके अनुष्ठान प्रारंभ करें। धूम्र वर्ण (कत्थई या भूरे) के आसन पर बैठकर लहसुनिया (Cat’s eye) या रुद्राक्ष की माला से चालीस दिनों के भीतर सत्रह हजार मंत्रों का जप पूर्ण करें। अनुष्ठान उपरांत कुशा (डाभ) की समिधा और घृत से दशांश हवन का विधान है। 1
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उशना
shanti mantraॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः । श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
bhakti mantraॐ रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः
tantrik mantraॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा
stotra mantraचक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्। दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः।। 7
vaidik mantraॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥